मेला श्रीदाऊजी महाराज के बाजार में इस बार ढोलक की थाप इस बार मंद पड़ गई है। हर साल जहां चार से पांच ढोलक की दुकानें सजती थीं, वहीं इस बार सिर्फ एक ही दुकान सजी है। विकल्पों की कमी और सीमित वैरायटी के चलते खरीदारी करने पहुंच रहीं महिलाओं व लोक कलाकारों को निराश होना पड़ रहा है।
उल्लेखनीय है कि दाऊजी मेले में वर्षों से ढोलक की दुकानों का अलग ही आकर्षण रहा है। शादी-ब्याह, कुआं पूजन, नामकरण और धार्मिक संकीर्तन जैसे आयोजनों के लिए ग्रामीण व शहरी अंचल की महिलाएं मेले से उच्च गुणवत्ता वाली आम, शीशम और कटहल की लकड़ी से बनी पारंपरिक ढोलक की खरीद करती थीं।
पिछले वर्षों तक मेरठ, मुरादाबाद, अमरोहा और दिल्ली से कई जाने-माने ढोलक निर्माता व कारीगर अपनी दुकानें लेकर आते थे, जिससे खरीदारों को तरह-तरह की थाप और साइज के वाद्य यंत्र आसानी से मिल जाते थे। इस वर्ष स्थिति पूरी तरह बदली हुई है। पूरे मेले में केवल अमरोहा से आए एकमात्र दुकानदार ने अपनी दुकान लगाई है।
मेले में खरीदारी करने पहुंचीं बीना देवी का कहना है कि जब चार-पांच दुकानें लगती थीं, तो ढोलक की आवाज, लकड़ी की परख और धुन का मिलान करके अपनी पसंद का वाद्य यंत्र चुनना आसान होता था। साथ ही दुकानों के बीच प्रतिस्पर्धा होने से मोलभाव की गुंजाइश भी रहती थी। लेकिन अब सिर्फ एक दुकान होने के कारण सीमित स्टॉक में से ही चयन करना मजबूरी बन गया है।
महंगी जगह और आवंटन की अनिश्चितता से घटे कारोबारी
गिरावट का मुख्य कारण मेले में दुकानों का अत्यधिक महंगा होना और जगह आवंटन में होने वाली व्यावहारिक दिक्कतें बताई जा रही हैं। अमरोहा से आए दुकानदार अमरुद्दीन ने बताया कि ढोलक जैसे पारंपरिक कुटीर उद्योग उत्पादों पर मार्जिन सीमित होता है। यदि मेले की जमीन का किराया और अन्य खर्चे बहुत अधिक बढ़ जाएं, तो बाहर से माल लाकर दुकान लगाना घाटे का सौदा साबित होता है।