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Holi: ब्रज की देहरी हाथरस में कभी टेसू के फूलों का चढ़ता था रंग, अब हर्बल गुलाल का है चलन

Sat, 21 Feb 2026 01:28 PM IST
चमन शर्मा विनीत चौरसिया, अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस

सार

होली 4 मार्च को है। होली पर हर्बल गुलाल की चर्चा हर बार चलती है। पहले लोग टेसू के फूलों से होली खेलना ज्यादा हर्बल समझते थे। आजादी से पहले हाथरस में बड़े पैमाने पर टेसू के फूलों की खेती होती थी। होली पर इन फूलों को उबालकर तैयार किया गया केसरिया रंग आसपास के जनपदों तक भेजा जाता था।
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टेसू के फूल और रंग-गुलाल - फोटो : संवाद
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विस्तार
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ब्रज की देहरी कहे जाने वाले हाथरस शहर में सजने वाले होली के बाजार ने बीते सात दशकों में लंबा सफर तय किया है। कभी टेसू के फूलों की खुशबू और उनके प्राकृतिक रंगों से सराबोर होने वाली होली आज हर्बल गुलाल के दौर तक पहुंच चुकी है। जनपद का रंग-गुलाल कारोबार अपनी अलग पहचान रखता है और देशभर में यहां तैयार उत्पादों की आपूर्ति होती है।

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आजादी से पहले हाथरस में बड़े पैमाने पर टेसू के फूलों की खेती होती थी। होली के अवसर पर इन फूलों को उबालकर तैयार किया गया केसरिया रंग आसपास के जनपदों तक भेजा जाता था। प्राकृतिक रंगों की मांग इतनी अधिक थी कि किसानों के लिए यह आय का अच्छा स्रोत माना जाता था।

समय बदला और आजादी के बाद आधुनिक रंगों का चलन शुरू हुआ। डाइज कलर के माध्यम से रंग तैयार करने की छोटी-छोटी उत्पादन इकाइयां स्थापित हुईं। मस्जिद वाले चौराहे पर सबसे पहले एक यूनिट शुरू होने की चर्चा बुजुर्ग कारोबारी आज भी करते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य परिवारों ने भी रंग बनाने का काम शुरू किया। बावजूद इसके बृज की देहरी हाथरस में होली की संस्कृति बरकरार है। यहां आज भी टेसू के फूलों का प्रयोग लोग होली पर करते हैं। ब्रज की सांस्कृतिक परंपरा में रची-बसी होली ने बदलते समय के साथ खुद को ढाला है। 

हमारा कारोबार आजादी से पहले का है। बुजुर्ग बताते थे कि एक समय केवल टेसू के फूलों से ही होली खेली जाती थी। उस दौर में यहां बड़े पैमाने पर खेती होती थी। आज भी हमारी दुकान से होली पर करीब 10 क्विंटल टेसू के फूलों की बिक्री हो जाती है। अब माल राजस्थान और मध्यप्रदेश से मंगाना पड़ता है।-रवि कुमार, जड़ी-बूटी विक्रेता।

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आजादी से पहले तक टेसू के फूलों का ही चलन था। बाद में डाइज कलर से रंग बनाने की शुरुआत हुई। बुजुर्ग बताते हैं कि सबसे पहली यूनिट मस्जिद वाले चौराहे पर खुली थी। समय के साथ कारोबार बढ़ता गया और अब हर्बल गुलाल के रूप में नया स्वरूप ले चुका है। सुरक्षा और गुणवत्ता को लेकर अब ग्राहक पहले से अधिक सजग हैं।-अभिनव गोयल, रंग-गुलाल कारोबारी।

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अरारोट के बेस पर बनता है हर्बल गुलाल
जिले में तैयार होने वाला अधिकांश हर्बल गुलाल अरारोट के बेस पर बनाया जाता है। सामान्यत: मक्के से बने अरारोट में फूड या फ्रूट कलर मिलाकर सुरक्षित गुलाल तैयार किया जाता है। इसे त्वचा के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है। कुछ वर्ष पहले तक खड़िया और सेलखड़ी जैसे तत्वों का उपयोग भी इसे बनाने में किया जाता था, जिससे सस्ता गुलाल तैयार होता था। हालांकि ऐसे उत्पादों की मांग अब काफी कम हो गई है और बाजार में गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जा रही है।

आज भी टेसू के फूलों की मांग
भले ही हर्बल गुलाल का चलन बढ़ गया है, लेकिन टेसू के फूलों की पारंपरिक मांग अभी भी बनी हुई है। होली के मौसम में जिले में 150 से 200 क्विंटल तक टेसू के फूलों की बिक्री हो जाती है। कई परिवार आज भी प्राकृतिक रंगों से होली खेलने को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि अब हाथरस में टेसू की खेती नहीं के बराबर है। अधिकतर फूल राजस्थान और मध्य प्रदेश से मंगाए जाते हैं। फुटकर बाजार में इनकी कीमत 80 से 150 रुपये प्रति किलो तक है।
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