विशेष सत्र न्यायालय एससी-एसटी एक्ट ने मारपीट व धमकाने के सात वर्ष पुराने मामले में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया है। वन विभाग के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पर मारपीट व जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए धमकाने का आरोप लगाया गया था। गवाही के दौरान गवाहों के मुकरने पर अदालत ने वादी के खिलाफ वाद दर्ज करते हुए नोटिस जारी करने का आदेश दिया है। ये भी कहा है कि यदि वादी ने कोई अनुदान राशि प्राप्त की है तो उसे एक माह में वापस करना होगा।
सात वर्ष पुराना है मामला
शिकोहाबाद (फिरोजाबाद) के रहने वाले मान सिंह वर्ष 2019 में वन विभाग में चालक पद पर तैनात थे। उनका आरोप था कि 27 मई 2019 को दोपहर करीब 12:30 बजे वह ड्यूटी पर थे। उसी दौरान डीएफओ कार्यालय के पास रेंज कार्यालय में तैनात चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हरिओम दुबे ने उनके साथ गाली-गलौज की, जातिसूचक शब्द कहे और लोहे के पाइप से मारपीट कर उनके हाथ की हथेली में फ्रैक्चर कर दिया। सरकारी गाड़ी से एक बाइक टकरा जाने के विवाद पर उनके साथ इतना कुछ हुआ। मान सिंह की शिकायत पर पुलिस ने मारपीट, धमकाने व एससी-एसटी एक्ट की धाराओं में चार्जशीट दाखिल की थी।
अदालत में मुकर गए गवाह
परीक्षण के दौरान अभियोजन पक्ष घटना को साबित करने में असफल रहा। वादी मान सिंह ही जिरह के दौरान अपने शुरुआती बयानों से पलट गए। उन्होंने अदालत में कहा कि गाड़ी बैक करते समय कहासुनी हुई थी और उनका पैर फिसल जाने के कारण वे गिर गए थे जिससे उन्हें चोट आई थी। दो अन्य गवाह भी घटना का समर्थन नहीं कर सके।
अदालत का निर्णय और सख्त आदेश
18 सितंबर 2026 को दिए गए फैसले में न्यायालय ने पाया कि तथ्य का कोई भी साक्षी घटना का समर्थन नहीं कर सका है। वादी ने खुद माना कि चोटें पैर फिसलकर गिरने से आई थीं। इसके आधार पर अदालत ने आरोपी हरिओम दुबे को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने माना कि वादी ने आरोपी के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराया और अदालत के समक्ष झूठे साक्ष्य दिए। इसके लिए वादी के खिलाफ बीएनएसएस की धारा 383(1) के तहत कार्रवाई के लिए अलग से वाद पंजीकृत कर नोटिस जारी करने का आदेश दिया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की विधि व्यवस्था का हवाला देते हुए कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि वादी ने एससी/एसटी एक्ट के तहत सरकार से कोई सहायता/अनुदान धनराशि प्राप्त की है, तो उसे एक माह के भीतर जिला समाज कल्याण विभाग में वापस जमा करना होगा। धनराशि जमा नहीं करने पर जिलाधिकारी हाथरस को उसकी वसूली करने के निर्देश दिए गए हैं।