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बसपा के लिए बजी खतरे की घंटी

Sat, 09 Jan 2016 11:39 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में दिखी विपक्षी एकजुटता ने बसपा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। यह पहला मौका नहीं है, जब जिले में बसपा के खिलाफ विपक्षी ने जबर्दस्त लामबंदी की है। इससे पूर्व भी 2005 में जिला पंचायत अध्यक्ष और उसके बाद जिला पंचायत उपाध्यक्ष, स्थानीय निकाय के एमएलसी के चुनाव में भी सभी दलों ने बसपा के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चा बनाकर उसके लिए मुश्किलें पैदा की थीं। जिला पंचायत उपाध्यक्ष का मुकाबला तो संयुक्त मोर्चा ने फतेह भी कर लिया था, जबकि बाकी चुनाव में भी वह बसपा को कड़ी चुनौती पेश करने में कामयाब रहा। यह बात अलग है कि बसपा के सियासी रुतबे के आगे विपक्ष को ज्यादातर मुकाबलों में शिकस्त ही मिली है।इस चुनाव में भी सत्तापक्ष अन्य दलों को लामबंद करके बसपा की सियासी जमीन को हिलाने में कामयाब हो गया। यही वजह है कि सत्तापक्ष का हौसला विजयी बसपा से भी ज्यादा बुलंद है। 
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यहां बसपा के खिलाफ खड़ा था विपक्षअलीगढ़ और दूसरे जिलों के मुकाबले हाथरस की सियासी तस्वीर इस बार भी बदली दिखी। प्रदेश के दूसरे जिलों में मुकाबला बेशक सत्ताधारी सपा बनाम अन्य दल था। हुकूमत के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने के लिए सभी दल मिलकर सत्तापक्ष को हराने के लिए लामबंद थे, लेकिन यहां इसके उलट सभी दल बसपा को घेरने के लिए इस तरह एक मंच पर आ गए, मानो जिले में बसपा की ही हुकूमत चल रही हो। इन दलों को हुकूमत का पूरा साथ भी मिला। इसके बावजूद बसपा एकजुट विपक्ष को चित करने में कामयाब रही। 

हाथरस में चलेगी बसपा विरोधी लहरविरोधियों की एकजुटता से साफ हो गया है कि आने वाले चुनावों में बेशक सूबे में सत्ता विरोधी हवा चलेगी, लेकिन जिले में सभी दलों के मुख्य निशाने पर बसपा ही रहेगी। हो सकता है कि भविष्य में बसपा को चित करने के लिए विरोधी दलों के ऐसे और भी मोर्चे आने वाले चुनावों में खड़े हो जाएं। लिहाजा बसपा के सामने भविष्य में भी इस मोर्चेबंदी से पार पाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
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बसपा की विफलता से विपक्ष एकजुट इसे बसपा की रणनीतिक विफलता ही कहेंगे कि वो जिले की सियासत में दूसरे दलों को अपने साथ खड़ा करने में अब तक नाकामयाब ही रही है, जबकि भाजपा और सपा कई बार उसके खिलाफ अन्य दलों को साथ लाने में कामयाब रही हैं। जाहिर है कि कहीं न कहीं इनके मुकाबले दूसरे दलों से बसपा का तालमेल ठीक नहीं रहा है या फिर जिले में बसपाई दिग्गजों का सियासी चाल-चलन ही ऐसा नहीं रहा है, जिससे दूसरे दल उसके साथ खड़ा होने में रुचि दिखाएं। यहां तक कि दूसरे दलों की एकजुटता में भी सेंध लगाने में बसपाई दिग्गज अब तक नाकाम ही रहे हैं। यही वजह है कि नाजुक मौकों पर बसपा दिग्गजों को लेने के देने पड़ जाते हैं। निश्चित रूप से इन चुनाव नतीजों से सबक लेकर बसपा को अपने खिलाफ दूसरे दलों की लामबंदी को रोकने पर भी मंथन करना होगा।

भविष्य की गोलबंदी पर मंथन शुरूब्लॉक प्रमुख का चुनाव हो या फिर आसन्न एमएलसी चुनाव। इन दोनों चुनावों के लिए एक बार फिर सभी दलों में बसपा के खिलाफ गोलबंदी पर मंथन शुरू हो गया है। इन दलों को उम्मीद है कि इन चुनावों में भी बसपा अपना बर्चस्व बनाने के लिए पूरा दम लगाएगी। बिना एकजुटता के उसे रोकना इन दलों के लिए आसान नहीं होगा। बसपा विरोधियों ने अभी से ही इस रणनीति पर चर्चा भी शुरू कर दी है।
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