न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
शुक्रवार को हुई बारिश के दौरान बिजली सिस्टम शोपीस बन गया। इस कारण जिले में लोगों को बिना बिजली के मुश्किलों से जूझना पड़ा। लोग बिना बिजली के कामकाज नहीं कर सके। देर रात तक शहर से देहात तक बिजली की आंख मिचौली जारी रही। कर्मी लाइनों में फॉल्ट दूर करने में जुटे रहे। वहीं कई स्थानों पर ट्रांसफॉर्मरों की जाली व खंभे में करंट आने की भी सूचनाएं आईं।
उल्लेखनीय है कि हर रोज जर्जर लाइनों के चलते कई कई घंटे लोगों को बिना बिजली के रहना पड़ रहा है। विभागीय अधिकारी समस्या को दूर करने पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। इसे लेकर लोगों में गुस्सा है। शुक्रवार की शाम को हुई बारिश के दौरान शहर के ओढ़पुरा, प्रगतिपुरम, वाटर वर्क्स, कांशीराम टाउनशिप व देहात के सोखना, मुरसान, सलेमपुर, वाहनपुर, नगला रति, हसायन आदि सबस्टेशनों से निकलने वाले फीडरों की लाइनों में फॉल्ट हो गए। इस कारण शहर के लोगों को कई घंटे तक बिना बिजली के रहना पड़ा।
जिन इलाकों में बिजली आपूर्ति सुचारु हो गई, वहां बार-बार फॉल्ट के चलते बिजली ने कई घंटे तक आंख मिचौली का खेल खेला। देहात के कई इलाकों में देर रात तक लोगों को बिना बिजली के रहना पड़ा। बिना बिजली लोग जरूरी कामकाज नहीं कर सके। बिजली आने का इंतजार करते रहे। अधिशासी अभियंता सुभाष चंद्रा का कहना है कि बारिश के चलते लाइनों में फॉल्ट आदि के चलते कुछ समय आपूर्ति प्रभावित रही है। फॉल्ट दूर कर कर्मी आपूर्ति को सुचारु करने में जुटे हुए हैं। संवाद
कुछ देर की बारिश में बिजली सिस्टम शोपीस बन गया है। बिना बिजली के खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। विभाग द्वारा लाइनों के रखखाव पर ध्यान नहीं दिया गया। इस कारण दिक्कतों से जूझना पड़ रहा है।
- मनोज कुमार
बिजली व्यवस्था सुधरने का नाम नहीं ले रही है। आए दिन बिजली गुल होना आम बात हो गई है। बिना बिजली के कामकाज प्रभावित होने के साथ उद्योग-धंधे भी प्रभावित हो रहे हैं। बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा है।
-मुकुल गुप्ता
बारिश के दौरान लाइनों में फॉल्ट हो गए हैं। इस कारण काफी देर तक बिना बिजली के रहना पड़ा है। विभागीय कर्मी व अधिकारी बिजली आने के बारे में कोई संतोषजनक जवाब नहीं देते हैं। इस कारण ज्यादा परेशानी होती है।
-अजय कुमार
बिजली विभाग द्वारा पर्याप्त आपूर्ति देने के दावे किए जाते हैं। हकीकत यह है कि हर रोज चार से पांच घंटे बिजली गुल हो रही है। इस कारण काम नहीं हो पा रहे हैं। विभागीय अधिकारियों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।
-लोकेश वार्ष्णेय