चश्मों की बढ़ती मांग के चलते जिले में कई दुकानदार खुद को ऑप्टोमेट्रिस्ट बताकर बिना डिग्री लोगों की आंखों की जांच कर रहे हैं। सही जांच न होने व उपयुक्त चश्मे का चयन न होने से लोगों की आंखों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आर्थिक फायदे के लिए यह दुकानदार लोगों की आंखों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं।
आंखों की जांच करने वाले व्यक्ति को दो साल का कोर्स करना होता है। इसके अतिरिक्त मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण भी कराना होता है, लेकिन चश्मे के दुकानदार बिना किसी कोर्स के ही लोगों की आंखों का परीक्षण कर रहे हैं। अनुमानित तौर पर जिले में 30 से 40 चश्मे की दुकानें संचालित हैं। यह दुकानदार ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में लोगों की आंखों का परीक्षण भी कर रहे हैं।
लोग नेत्र परीक्षक की फीस बचाने के चक्कर में इनके चंगुल में फंस जाते हैं। यह दुकानदार अलग-अलग नंबरों का चश्मा लगाकर मरीज से पूछते हैं कि साफ दिखाई दे रहा है या नहीं। मरीज की हां पर चश्मा तैयार कर दिया जाता है। सही जांच न होने से मरीजों को गलत नंबर का चश्मा मिलता है। यह चश्मा मरीज की आंखों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
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यह हैं नुकसान-
- गलत नंबर का चश्मा लगाने से दृष्टि में गिरावट आती है।
- गुणवत्तापूर्ण चश्मा न होने से आंखों में संक्रमण व तनाव का खतरा रहता है।
- बार-बार चश्मा बदलवाने का आर्थिक व मानसिक दबाव।
- आंखों की गंभीर समस्या का छिप जाना।
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वर्जन-
बिना कोर्स किए मरीजों की आंखों का परीक्षण नहीं किया जा सकता। शिकायत मिलने पर ऐसे दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. मंजीत सिंह, सीएमओ, हाथरस।