कुपोषण की रोकथाम के लिए मातृ शिशु मृत्यु दर व मातृ बाल कुपोषण में कमी लाने के लिए अब प्रदेश में कुपोषण मुक्त गांव स्थापित किए जाएंगे। जिले में भी कुपोषण गांव बनाने के संबंध में शासन ने दिशा निर्देश दिए हैं। विभागों द्वारा चलाई जा रहीं विभिन्न योजनाओं के लिए मानक व स्कोरिंग निर्धारित करते हुए गांव को चरणबद्ध तरीके से कुपोषण मुक्त मनाया जाएगा।
शासनादेश जारी कर निर्देश दिए गए हैं कि कुपोषण मुक्त गांव बनाने के लिए राजस्व गांवों को गोद लेने वाले जनपदीय अधिकारियों द्वारा कम से कम दो राजस्व गांवों को गोद लेना अनिवार्य होगा। एक विकास खंड के सभी गांवों को एक साथ कुपोषण मुक्त गांव बनाने के लिए चयन करने की कोई अनिवार्यता नहीं होगी। कुपोषण मुक्त गांव की कार्यवाही के लिए स्वास्थ्य, आईसीडीएस, पंचायतीराज, बेसिक शिक्षा एवं ग्राम्य विकास विभाग के साथ खाद्य विभाग का एक मानक आवश्यक मानकों की सूची में शामिल किया गया है। कुल 12 मानक निर्धारित किए गए हैं।
दो मुख्य एवं अनिवार्य मानकों में गांव में 75 फीसदी गर्भवती महिलाएं आयरन फोलिक एसिड की निर्धारित मात्रा का सेवन करें, ताकि गर्भावस्था के आखिरी त्रैमास में किसी भी गांव में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की व्यापकता 25 फीसदी से कम न हो, जो कि वर्तमान में 50 फीसदी है। गांव में छह माह से पांच साल तक का कोई बच्चा डब्ल्यूएचओ ग्रोथ चार्ट के अनुसार लाल श्रेणी में न हो। वही गांव कुपोषण मुक्त कहे जाएंगे, जो दोनों अनिवार्य तथा आवश्यक मानकों में 75/100 का सूचकांक प्राप्त करेंगे। कुपोषण मुक्त गांव बनाने की कार्यवाही में ग्राम प्रधान द्वारा पूर्ण सहयोग दिया जाएगा।
इसके लिए ब्लाक स्तर पर होने वाले फील्ड कर्मियों के संयुक्त प्रशिक्षण में ग्राम प्रधान, पंचायत सचिवों को भी प्रशिक्षित किया जाएगा। कुपोषण मुक्त गांव बनाने के लिए गांव के चयन एवं बेसलाइन की सूचना संकलन/वेबसाइट पर फीडिंग आदि संबंधी कार्रवाई 31 अक्तूबर तक अनिवार्य रूप से पूर्ण की जाएगी। कुपोषण मुक्त गांव बनाने की योजना का क्रियान्वयन के लिए छह माह की गणना एक नवंबर 2017 से की जाएगी। शासन के मुख्य सचिव राजीव कुमार ने जिलाधिकारी को इन दिशा निर्देशों का अनुपालन करते हुए राजस्व गांव का चयन कर उसे कुपोषण मुक्त गांव बनाने की कार्रवाई सुनिश्चित किए जाने के निर्देश दिए हैं।