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Health: पेट के कीड़े छीन रहे बच्चों की एकाग्रता, पढ़ाई में नहीं लगता मन, रुक रहा मानसिक व शारीरिक विकास

Sat, 14 Feb 2026 12:32 PM IST
चमन शर्मा कमल वार्ष्णेय, अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस

सार

पेट के कीड़े बच्चों के शरीर से पोषक तत्वों को सोख लेते हैं, जिससे बच्चा एनीमिया (खून की कमी) और कुपोषण का शिकार हो जाता है। जब शरीर में आवश्यक ऊर्जा और पोषण की कमी होती है, तो इसका सीधा असर मस्तिष्क की कार्यक्षमता पर पड़ता है।
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पेट के कीड़े से समस्या - फोटो : Adobe stock
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विस्तार
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बच्चों के पेट में मौजूद कीड़े न सिर्फ उनके स्वास्थ्य को हानि पहुंचा रहे हैं, बल्कि उनकी एकाग्रता भंग कर उन्हें पढ़ाई में भी पीछे ढकेल रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार इससे बच्चे कुपोषित तो हो ही रहे हैं, साथ ही इसका सीधा असर मस्तिष्क की कार्यक्षमता पर पड़ रहा है। हालात यह है कि 100 में एक बच्चा कुपोषण का शिकार है।

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बाल रोग विशेषज्ञ डाॅ.पंकज शर्मा ने बताया कि पेट के कीड़े बच्चों के शरीर से पोषक तत्वों को सोख लेते हैं, जिससे बच्चा एनीमिया (खून की कमी) और कुपोषण का शिकार हो जाता है। जब शरीर में आवश्यक ऊर्जा और पोषण की कमी होती है, तो इसका सीधा असर मस्तिष्क की कार्यक्षमता पर पड़ता है। ऐसे बच्चे अक्सर थकान महसूस करते हैं और उनका मन पढ़ाई या किसी भी कार्य में नहीं लग पाता।

स्वास्थ्य विभाग और बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग संयुक्त रूप से कुपोषण रोकने पर काम कर रहा है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर चिह्नित बच्चों को पौष्टिक आहार देते हैं, स्वास्थ्य विभाग छह जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध कराता है। आवश्यकता पड़ने पर कुछ बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया जाता है।
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पिछले माह 1150 कमजोर बच्चे चिह्नित किए गए हैं, इनमें से 20 बेहद कमजोर को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया गया है। वर्ष 2025 में 242 बच्चे पुनर्वास केंद्र में भर्ती किए गए थे। अधिकांश मामलों में कुपोषण की एक बड़ी वजह पेट के कीड़े सामने आए हैं। जिला कार्यक्रम अधिकारी धर्मेंद्र के अनुसार जिले में कुपोषित बच्चे मिलने का औसत एक फीसदी है।

बच्चे का पढ़ाई में मन न लगने व चिड़चिड़ा रहने की वजह पेट के कीड़े हो सकते हैं। छह-छह माह के अंतराल पर दो बार दवा देनी होती है। दवाएं खिलाने में जिले की स्थिति प्रदेश में बेहतर है। शेष बच्चों को भी दवा दिलाने पर जोर दिया जा रहा है।-डाॅ. राजीव गुप्ता, एसीएमओ।

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साल में दो बार अभियान
साल में दो बार फरवरी और अगस्त में राष्ट्रीय कृमि मुक्त अभियान चलाया जाता है। इस वर्ष फरवरी के लिए 8.71 लाख बच्चे चिह्नित किए गए हैं। दस फरवरी को 7.29 लाख बच्चों को दवा पिलाई गई। शेष बच्चों को शुक्रवार को दवाई दी गई।

ये हैं छह जीवन रक्षक दवाएं
  • एल्बेंडाजोल : यह पेट के कीड़ों को खत्म करती है।
  • एंटीबायोटिक : घातक संक्रमण से बच्चों का बचाव करती है।
  • एमोक्सिलिन : निमोनिया व श्वसन तंत्र के संक्रमण रोकने के लिए।
  • विटामिन-ए और डी : विटामिन-ए आंखों और डी हड्डियों के लिए।
  • जिंक : दस्त के दौरान शरीर से खत्म हुए पोषक तत्वों की भरपाई के लिए।
  • आयरन एंड फोलिक एसिड : खून की कमी को दूर करने तथा दिमागी विकास के लिए।
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