खेती में लगातार बढ़ रहे रासायनिक खाद और कीटनाशकों के दुष्प्रभावों को देखते हुए किसान अब आर्गेनिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। किसान प्राकृतिक तरीकों का उपयोग कर मिट्टी की सेहत सुधारने और लागत घटाने पर जोर दे रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों किसान आलू की फसल की बुवाई हाथ से कर रहे हैं और पारंपरिक पद्धति को अपना रहे हैं।
गांव मड़नई में प्रगतिशील किसान जगवीर सिंह बड़ेल ने बताया कि उनके द्वारा आलू की आर्गेनिक खेती की जा रही है। वह खुद अपने हाथों से खेत के एक हिस्से में आलू लगा रहे हैं। उन्होंने बताया कि रासायनिक खादों से खेती की लागत बढ़ती जा रही थी और मिट्टी की उर्वरक क्षमता लगातार कम हो रही थी। इसी कारण अब वे गोबर खाद, जीवामृत, घनजीवामृत और वर्मी कंपोस्ट का उपयोग कर जैविक खेती अपना रहे हैं। इस खेती से पैदा होने वाली फसल न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, बल्कि बाजार में भी अच्छी कीमत दिला रही है। उन्होंने बताया कि आलू की हाथ से बुवाई करने पर बीज की बर्बादी नहीं होती और पौधों की रोपाई एक समान दूरी पर होती है, जिससे पैदावार बेहतर होती है। खेतों की जुताई के बाद क्यारियां बनाकर आलू बीज की एक-एक कर बुवाई कर रहे हैं। आर्गेनिक खेती से जुड़ चुके कई अन्य किसानों का मानना है कि यह खेती भविष्य के लिए लाभकारी है और इससे मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है। जैविक खेती से पैदावार तो धीरे-धीरे बढ़ती है, लेकिन फसल की गुणवत्ता उच्च होती है और उसकी बाजार में विशेष मांग रहती है।
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