क्षेत्र के गांव नगला मनी निवासी लांस नायक सुभाष चंद्र के जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में हुए बलिदान पर ग्रामीणों और परिजनों को गर्व है। उनके साथी बताते हैं कि पहली ही मुठभेड़ में सुभाष के हेलमेट में गोली लग गई थी, लेकिन वह घबराए नहीं और उनका देश के प्रति जोश और जुनून कम नहीं हुआ। वह आतंकियों के खिलाफ चलाए कई अभियान में शामिल रहे और उन्हें ढेर किया।
गांव नगला मनी निवासी सुभाष (28) पुत्र मथुरा प्रसाद वर्ष 2016 में मैनपुरी में हुई सेना की भर्ती रैली में शामिल हुए और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उनकी तैनाती सात जाट बटालियन में हुई थी। तीन बार उनका चयन जम्मू कश्मीर राष्ट्रीय राइफल में हुआ। ग्रामीण और परिजन बताते हैं कि वह सात जुलाई को एक माह की छुट्टी काटकर गए थे। इस दौरान उनकी दादी साहबो का निधन हो गया था। 30 जून को उनकी तेरहवीं थी।
उनके दोस्त रंजीत, हरेंद्र और हरकेश बताते हैं वे तीनों और सुभाष एक साथ दौड़ लगाते थे और सेना भर्ती की तैयारी करते थे। हरेंद्र और सुभाष का चयन सेना में हो गया। रंजीत और हरकेश खेती करते हैं। हरेंद्र इस समय गांव में छुट्टी पर आए हुए हैं और सुभाष के बलिदान की सूचना से उनकी आंखे नम हो गई। इनका कहना है कि ऐसा दोस्त मिलना मुश्किल है, वह बहुत ही साहसी था। उनके बलिदान से परिजनों में गम का माहौल है और उनका रो-रो कर बुरा हाल है। वह उनकी बातें याद कर बिलख रहे हैं।
एक माह बाद घर में गूंजनी थी किलकारी….जाने से पहले बहुत खुश थे सुभाष
सुभाष की चार साल पहले शादी हुई थी। उनके डेढ़ वर्ष की एक पुत्री ऋतिका है। पत्नी कांति देवी आठ माह की गर्भवती है। एक माह बाद घर में किलकारी गूंजनी थी। सुभाष भी काफी खुश थे और सात जुलाई को जाने से पहले वह दीपावली पर आने की कोशिश करने की बात कहकर गए थे।
सेना भर्ती की दौड़ में आया था प्रथम, गांव में सबका दुलारा था
मित्र रंजीत और हरकेश बताते हैं कि 2016 में मैनपुुरी में हुई सेना की भर्ती में शामिल हुए लगगभग 100 युवाओं के बैच में सुभाष प्रथम आया था। इससे पहले हम लोग सुबह ही दौड़ने निकल जाते थे, एक मित्र हरेंद्र भी 2017 में सेना में भर्ती हो गया। सुभाष ने आज भी दौड़ना नहीं छोड़ा था, जब भी वह छुट्टी पर आता तो सुबह दौड़ लगाने जाता था। पूरे गांव का वह दुलारा था। सबसे बड़ी आत्मीयता से मिलता और बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लेता था। रंजीत और हरकेश बताते हैं कि सुभाष को कोई घमंड नहीं था। जब छुट्टी आते, कोई कुछ भी काम बताता, तुरंत कर देते थे।
आंखें नम, निशब्द हुए पिता बोले-अब क्या कहूं
सुभाष के बलिदान की सूचना से पिता मथुरा प्रसाद निशब्द है। आंखे नम हैं और बस इतना ही बोल पाए कि क्या कहूं...इसके बाद आंखों से आंसू बह निकलने। मथुरा प्रसाद के तीन पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र होमगार्ड में थे और उनकी आठ साल पहले मौत हो चुकी है। मंझला बलदेव पिता के साथ गांव में रहकर खेती करता था। बलदेव और सुभाष की शादी आगरा के खंदौली थाना क्षेत्र के गांव दौलतगढ़ी में दो सगी बहनों से हुई थी।