कभी प्रदेश में अलग पहचान रखने वाला हाथरस का दाल उद्योग कच्चे माल के लिए दूसरे राज्यों और देशों पर निर्भर हो गया है। एक समय जिले में 160 से अधिक दाल मिलें थीं, लेकिन अब उनकी संख्या घटकर करीब 40 रह गई है। स्थानीय स्तर पर दलहन उत्पादन लगातार घटने से मिल संचालकों को कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, म्यांमार, रूस और अफ्रीकी देशों के अलावा राजस्थान व मध्य प्रदेश से दालें मंगानी पड़ रही हैं।
जिले का कुल क्षेत्रफल 1.80 लाख हेक्टेयर से अधिक है, जिसमें करीब 1.48 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है। पहले यहां उड़द, मसूर, चना, मूंग, मटर और अरहर की अच्छी पैदावार होती थी, लेकिन अब स्थिति यह है कि जिले में केवल करीब 2500 हेक्टेयर क्षेत्र में ही अरहर की खेती बची है। उड़द, मूंग, मसूर और चने का उत्पादन लगभग समाप्त हो चुका है।
किसानों का रुझान अब आलू, गेहूं, धान, मक्का और बाजरा जैसी फसलों की ओर बढ़ गया है। दलहन की खेती कम होने से दाल मिलों के सामने कच्चे माल का संकट गहरा गया है। मजबूरी में मिल संचालक बाहर से दालें मंगाकर उनकी सफाई, छंटाई और प्रोसेसिंग कर बाजार में भेज रहे हैं।
कारोबारियों के अनुसार मसूर मुख्य रूप से कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से आती है। चना ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और रूस से मंगाया जाता है, जबकि अरहर और उड़द की आपूर्ति म्यांमार तथा मोजाम्बिक, मलावी सहित कई अफ्रीकी देशों से होती है। वहीं मूंग और कुछ अन्य दलहन राजस्थान एवं मध्य प्रदेश से खरीदे जा रहे हैं। दलहन कारोबारियों का कहना है कि परिवहन खर्च, बिजली की बढ़ती लागत, अन्य खर्चों और स्थानीय उत्पादन में गिरावट के कारण कारोबार का लाभ लगातार कम होता जा रहा है। शासन स्तर पर उद्योग को विशेष प्रोत्साहन नहीं मिलने से हाथरस का कभी प्रसिद्ध रहा दाल उद्योग धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।
लगातार एक ही फसल बोने से कमजोर हुई जमीन
दाल के कारोबारियों के अनुसार जिले में दलहन उत्पादन घटने की एक बड़ी वजह फसल चक्र का पालन नहीं होना है। पिछले कई वर्षों से किसान अधिक लाभ के कारण लगातार आलू, गेहूं, धान और मक्का जैसी फसलें उगा रहे हैं। एक ही खेत में बार-बार एक ही प्रकार की फसल लेने से मिट्टी में उसी फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। इससे भूमि की उर्वरक क्षमता प्रभावित होती है और समय के साथ उस फसल का उत्पादन लगातार घटने लगता है।
दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान तक पहुंच रही हाथरस की दाल।
स्थानीय स्तर पर दलहन का उत्पादन कम होने के बावजूद हाथरस का दाल उद्योग आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है। यहां की दाल मिलों में विदेशों और अन्य राज्यों से आने वाली कच्ची दालों की साफ-सफाई, छिलाई, ग्रेडिंग और पैकिंग के बाद तैयार दाल की आपूर्ति दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में की जाती है। कारोबारियों का कहना है कि हाथरस की मिलों में तैयार दाल की गुणवत्ता और बेहतर प्रोसेसिंग के कारण आज भी बड़े थोक व्यापारी यहां से माल खरीदते हैं।
पहले हाथरस की मिलों में स्थानीय किसानों की दाल ही पर्याप्त मात्रा में मिल जाती थी, लेकिन अब अधिकांश कच्चा माल बाहर से मंगाना पड़ता है। आयात और परिवहन लागत बढ़ने से कारोबार पहले जैसा लाभकारी नहीं रह गया है।
-कपिल अग्रवाल, तैयार दालों के ट्रेडर्स।
स्थानीय स्तर पर दलहन उत्पादन लगभग खत्म होने की वजह से मिलें पूरी क्षमता से नहीं चल पा रही हैं। यदि दलहन उत्पादन बढ़ाने और उद्योग को प्रोत्साहन देने की योजना बने तो हाथरस का दाल उद्योग फिर से अपनी पुरानी पहचान हासिल कर सकता है।-गोविंद प्रसाद अग्रवाल, दाल मिल संचालक।