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हाथरस : तब गांव के शेर सिंह ने सबसे पहले चंदे में मुझे दिए थे 10 पैसे

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हाथरस : डॉ. बंगाली सिंह, पूर्व सांसद। संवाद - फोटो : HATHRAS
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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दो बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके डॉ. बंगाली सिंह कहते हैं कि जितना ताम-झाम अब चुनाव में होता है। उतना ताम-झाम पहले नहीं था। अब चुनाव में प्रत्याशी करोड़ों रुपये फूंक देते हैं। डॉ. बंगाली सिंह बताते हैं कि जब वह वर्ष 1974 में वह पहला चुनाव लड़े तो सबसे पहले उन्हें उनके ही गांव के एक व्यक्ति ने 10 पैसे चंदे में दिए। उसके बाद तो अन्य लोगों ने भी चंदा दिया और चुनाव में उनके केवल एक लाख रुपये खर्च हुए।
डॉ. बंगाली सिंह वर्ष 1977 में जनता पार्टी और 1985 में लोकदल से सासनी (सुरक्षित) सीट से विधायक रहे हैं। अब नए परिसीमन में यह सीट समाप्त हो गई है। उसके बाद वह जनता दल से वर्ष 1989 में हाथरस संसदीय सीट से सांसद भी रहे हैं। जब डॉ. सिंह ने चुनाव को लेकर चर्चा की गई तो 83 वर्षीय पूर्व सांसद पुरानी यादों में खो गए। पुरानी यादें ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि वह वर्ष 1967 में सबसे पहले पंच बने और फिर प्रधान। इस दौरान वर्ष 1974 में जनसंघ के कुछ पदाधिकारी उनके पास चुनाव लड़ने का प्रस्ताव लेकर आए और उनसे यह कहने लगे कि डॉक्टर साहब आपको बस हामी भरनी है। चुनाव में सभी जुट जाएंगे। पूर्व सांसद ने बताया कि उनके पिता नहीं चाहते थे कि वह चुनाव लड़ें, लेकिन उनके साथ के सभी लोग यह चाहते थे कि वह चुनाव लड़ें। आखिरकार उनके पिता भी मान गए।
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हाथरस के जलेसर रोड स्थित गांव लाढ़पुर निवासी पूर्व सांसद बताते हैं कि उन्हें सबसे पहले गांव के ही शेर सिंह ने चुनाव के लिए चंदा दिया। वह था 10 पैसे। उसके बाद और चंदे के व्यवस्था हुई। सबसे ज्यादा चंदा 200 रुपये उन्हें हाथरस शहर के एक उद्यमी धर्मपाल मेहरा ने दिया। इस तरह से 40 हजार रुपये का चंदा हुआ। हालांकि इस चुनाव में एक लाख रुपये खर्चा हुआ। पूर्व सांसद बताते हैं कि इस चुनाव को वह हार गए लेकिन उसके अगला चुनाव वर्ष 1977 में वह जनता पार्टी से जीत गए। इस चुनाव में तो जो चंदा हुआ था। उसमें से भी 12 हजार रुपये बच गए। डॉ. सिंह बताते हैं कि पहले चुनाव को लेकर रंजिशें होती नहीं थी। कोई ताम-झाम नहीं था।
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जब वह विधायक थे तो उन पर कोई अंगरक्षक नहीं था। और तो और उन्होंने बाइक पर ही अपना चुनाव प्रचार किया। जो चंदे का पैसा बचा, उससे जनता के काम कराए। पहले लोगों की यह मांग रहती थी कि हमारे गांव में बिजली आ जाए। कुएं खुद जाएं और खड़ंजा हो जाए। ऐसे में यह काम वह कर देते थे। डॉ. सिंह यह दिलचस्प किस्सा भी सुनाते हैं कि वर्ष 1977 में उनके खिलाफ कांग्रेस के डॉ. धर्मपाल सिंह चुनाव लड़ रहे थे। वह वोट के साथ-साथ चंदा मांगने भी उनके घर आ गए तो उनके घरवालों ने उन्हें खाली हाथ नहीं लौटाया और उन्हें चंदा भी दिया। डॉ. सिंह कहते हैं कि अब तो बड़ा ताम-झाम है चुनाव में। करोड़ों खर्च करने पड़ते हैं। पहले तो अच्छे आदमी को अपने आप पार्टियां टिकट दे देती थीं और पब्लिक चंदा दे देती थी और वह आसानी से चुनाव जीत जाता था। संवाद
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