न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
ग्राहकों को भ्रमित कर उन्हें हाथरस के नाम पर ऐसी हींग बेची जा रही है जो घटिया औरसस्ती है। ऐसे में हाथरस की हींग की साख को बट्टा लग रहा है। कई हींग उद्यमी कहते हैं कि ग्राहक पैक्ड हींग ही लें। इससे कम से कम गुणवत्ता सुनिश्चित रहेगी। उधर, यहां सरकारी लैब न होने की वजह से उद्यमियों को काफी दूर-दूर तक अपने नमूने जांच के लिए भेजने पड़ते हैं। इससे पैसा और समय दोनों लगता है।
ग्राहक भ्रम में 400 से लेकर 15000 रुपये प्रति किलो दाम
हाथरस में हींग का कच्चा माल अफगानिस्तान, ईरान व कई बाहरी अन्य मुल्कों के आता है। उसके बाद इसमें स्टार्च, मैंदा, गोंद आदि मिलाकर हींग तैयार की जाती है। करीब 120 साल से यहां हींग का कारोबार हो रहा है। यहां 400 से लेकर 15 हजार रुपए किलो ग्राम की कीमत तक की हींग बिक रही है। ग्राहक भ्रम में रहता है। दरअसल हींग की गुणवत्ता का कोई पैमाना आम आदमी की जानकारी में नहीं हैं। ऐसे में उसके ठगे जाने की आशंका काफी होती है। स्थानीय कारोबारी कहना है कि उन्हें अपने सैंपल आगरा, गुड़गांव, फरीदाबाद, दिल्ली भेजने पड़ते हैं। तब यह पता चलता है कि जो उन्होंने माल बनाया है, वह सही है। तब अपने प्रोडक्ट को बाजार में उतारते हैं। यदि यहां सरकारी लैब स्थापित हो जाए तो उन्हें लाभ मिलेगा। संवाद
हींग की गुणवत्ता की पहचान लंबे समय से इसका काम करने वाले को होती है। हींग को फुटकर में काफी बेचा जाता है। काफी हींग तो बिना किसी लेबल के बिकती है। आम ग्राहक को यह मालूम ही नहीं होता कि इसकी कीमत क्या है । काफी फुटकर दुकानदार सस्ती हींग लेकर उसे मानक के विपरीत ऊंचे रेटों पर बेचते हैं। जबकि उसकी कीमत काफी कम होती है। ऐसे में लोगों को चाहिए कि वह खुली हींग न खरीदें, पैक्ड हींग ही खरीदें, जिस पर किसी फर्म का लेबल व अन्य चीजें लिखी हों।
प्रतीक अग्रवाल, हींग उद्यमी
यहां हींग परीक्षण के लिए लैब की स्थापना जरूरी है। इसके लिए पहले प्रयास भी हुए लेकिन अभी यह प्रयास सफल नहीं हो सके हैं। हींग के नमूनों को परीक्षण के लिए हमें बाहर भेजना पड़ता है। इसका खर्चा भी ज्यादा आता है और समय भी लगता है। यहां सरकारी लैब खुलनी चाहिए। इसकी लंबे समय से मांग की जा रही है। वहीं लोगों को हींग गुणवत्ता परख ही खरीदनी चाहिए।
राजकुमार अग्रवाल, हींग उद्यमी।