न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
सन 1755 में जर्मनी में आज ही के दिन एक वैज्ञानिक ने जन्म लिया। उन्होंने एक ऐसी चिकित्सा पद्धति को जन्म दिया जो आज पुरानी और लाइलाज बीमारियों को ठीक करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। आज यह पद्धति हानि रहित समूल रोगनाशक चिकित्सा पद्धति बन गई है। ये बातें विश्व होम्योपैथी दिवस पर सादाबाद के वरिष्ठ होम्यो चिकित्सक और साइंटिफिक कमेटी एचएमएआई उत्तर प्रदेश के चेयरमैन डॉ. यूएस गौड़ ने अमर उजाला से बातचीत में कहीं।
उन्होंने कहा कि इस महान वैज्ञानिक ने भारतीय शास्त्रों से लिए फार्मूले समं सम: समयती के आधार पर होम्योपैथी नामक चिकित्सा पद्धति को जन्म दिया। जिस समय पूरा विश्व तरह तरह की बीमारियों से जूझ रहा था दवाओं के दुष्परिणाम भी गंभीर थे, मलेरिया नामक बीमारी के उपचार के लिए प्रयुक्त की जाने वाली कुनैन एकमात्र औषधि थी, उसके भी दुष्परिणाम गंभीर थे उसके बाद भी पुन: संक्रमित न होने की कोई गारंटी नहीं थी। उस समय 1976 में डा.ॅ सैमुअल क्रिश्चियन फेड्रिक हेनमैन ने सिमिलिया सिमिलीबस क्योरंटर सिद्धांत पर होम्योपैथी का आविष्कार किया।
होम्योपैथिक दवाओं को स्वस्थ व्यक्तियों को देकर उनके प्रभाव सूचीबद्ध किए गए, इतने समय उपरांत भी ये दवाएं आज तक निष्प्रभावी नहीं हुई। वर्तमान मे होमियोपैथी को चिकित्सा का सुप्रीम कोर्ट माना जाता है। बहुत सी गंभीर बीमारियों में होम्योपैथिक दवाएं रामबाण सिद्ध होती हैं। कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने में वैक्सीन की तरह ही कारगर रही है। जो लोग होम्योपैथी कि दवाएं खाते हैं, वे बहुत कम बीमार होते है और कम समय में ठीक हो जाते है।