फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Hathras News: फूड कोर्ट ने दिखाई राह, तहबाजारी घटे तो सस्ता हो मेला

Wed, 23 Sep 2026 02:24 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
विज्ञापन
मेला परिसर में लगे फूड कोर्ट में लगी भीड़। संवाद - फोटो : Samvad
विज्ञापन
प्रशासन ने इस वर्ष मेला परिसर में शहर के एक प्रतिष्ठित कैटरर्स व मिठाई कारोबारी को मुफ्त जमीन देकर सुव्यवस्थित फूड कोर्ट तैयार कराया है। अतिरिक्त किराये से मुक्त होने के कारण यह फूड कोर्ट बाजार भाव पर ही देसी घी के व्यंजन उपलब्ध करा रहा है। कारोबारियों का तर्क है कि यही प्रयोग पूरे परिसर पर किया जाए, तो मेला आम लोगों की जेब पर भारी नहीं पड़ेगा।
विज्ञापन

फूड कोर्ट के इस फॉर्मूले ने मेला प्रांगण के अन्य व्यापारियों और झूला संचालकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार जिला प्रशासन हर साल मेले का तहबाजारी ठेका निजी ठेकेदारों को देता है। ठेकेदार भारी-भरकम बोली लगाकर ठेका हासिल करते हैं और फिर अपना मुनाफा निकालने के लिए छोटे-बड़े दुकानदारों, झूला संचालकों और खेल-तमाशों वालों से मनमाना किराया वसूलते हैं।
आलम यह है कि महज 10 फीट चौड़ी दुकान लगाने के लिए व्यापारियों को 40 से 50 हजार रुपये तक की मोटी रकम चुकानी पड़ रही है। इस भारी लागत की भरपाई दुकानदार उत्पादों और खान-पान के दाम बढ़ाकर करते हैं, जिससे अंततः ग्रामीण व मध्यमवर्गीय लोग महंगाई की चक्की में पिसते हैं।
विज्ञापन


राजकीय बजट से हों व्यवस्थाएं, बंद हो तहबाजारी ठेका
व्यापारियों और समाजसेवियों का तर्क है कि दाऊजी मेला अब राजकीय घोषित हो चुका है और लगातार तीसरे वर्ष शासन से इसके लिए भारी धनराशि का बजट अवमुक्त हो रहा है। ऐसे में रंगाई-पुताई, बैरिकेडिंग, टेंट और बुनियादी सुविधाओं के लिए तहबाजारी के ठेके पर निर्भर रहने का कोई औचित्य नहीं है। यदि शासन से मिलने वाले बजट से मेले की व्यवस्थाएं कराई जाएं और तहबाजारी का ठेका खत्म कर दुकानदारों को फ्री जमीन दी जाए, तो कोई भी दुकानदार ऊंचे दाम नहीं वसूलेगा। रही बात सांस्कृतिक कार्यक्रमों की, तो पंडाल में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों का मुख्य खर्च शहर के समाजसेवी संयोजक और प्रायोजक स्वयं वहन करते हैं, मेला प्रशासन से मिलने वाली सहायता राशि तो महज सांकेतिक होती है।


अगर फूड कोर्ट की तरह प्रशासन हमें व अन्य दुकानदारों को निशुल्क या महज दो-ती हजार रुपये की सांकेतिक फीस पर जमीन मुहैया करा दे, तो हम गारंटी देते हैं कि शहर के बाजार से भी 20 से 30 फीसदी सस्ते दामों पर एक से बढ़कर एक वैरायटी उपलब्ध करा देंगे।
-राकेश वार्ष्णेय, मिश्री की दुकान के संचालक।



फूड कोर्ट की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि अगर जमीन का किराया न देना पड़े तो दुकानदार सस्ता और बहुत ही उत्कृष्ट गुणवत्ता वाला सामान बेच सकता है। हम पिछले कई सालों से मेले में टिक्की-चाट का स्टॉल लगाते हैं, लेकिन आधी कमाई ठेकेदार को किराया देने में चली जाती है।
विज्ञापन

-अर्जुन कश्यप, चाट कारोबारी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें