संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस।
तनाव भरे जीवन में लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाना कठिन कार्य है और पुण्य कार्य भी। हास्य सम्राट कवि काका हाथरसी की यह नगरी इस कठिन कार्य को आसान बनाकर पुण्य कमाने में आगे रही है। इस कड़ी में कवि डॉ. जगदीश लवानिया का नाम भी जुड़ता है, जिन्होंने हास्य व्यंग्य के क्षेत्र में हिंदी की सेवा करके नाम कमाया और हाथरस नगर का मान बढ़ाया है।
10 जुलाई 1945 को अलीगढ़ जिले के छैछऊ गांव में जन्मे कवि डॉ. लवानिया का वर्ष 1971 से हाथरस नगर में स्थायी निवास है और हाथरस ही उनकी कर्मभूमि है। पेशे से शिक्षक रहे कवि डॉ. जगदीश लवानिया वर्ष 1971 में कवियों के लिए उर्वरा रही हाथरस नगरी में आए तो उनके अंदर भी कविता का बीज अंकुरित हो गया, जो पुष्पित पल्लवित हुआ। कवि डॉ. लवानिया की रचनाओं में हिंदी की बोली और बृज क्षेत्र की आंचलिक भाषा बृजभाषा का काफी समावेश है। उन्होंने हिंदी काव्य मंचों पर अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई और इन पर खुद को हास्य व्यंग्यकार के रूप में स्थापित किया। वे कई बार हाथरस के लक्खी मेला श्रीदाऊजी महाराज के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के संयोजक रहे। डॉ. लवानिया कुशल लेखक भी हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं और लेखनी के दम पर अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए हैं।
कवि डॉ. लवानिया को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से वर्ष 1987 में श्रीधर पाठक पुरस्कार मिला और भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने वर्ष 1994 में उन्हें पं. गोविंद बल्लभ पंत पुरस्कार से सम्मानित किया। डॉ. लवानिया वर्ष 1990 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के बृजभाषा विधा के अंतर्गत अनुशंसा पुरस्कार, वर्ष 2001 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ही पं. रामनरेश त्रिपाठी नामित पुरस्कार, वर्ष 2001 में ही बृज लोकनिधि संस्थान वृंदावन के स्वामी मेघश्याम स्मृति सम्मान, वर्ष 2005 में बृजकला केंद्र मथुरा के गंगाप्रसाद सराफ साहित्य पुरस्कार, वर्ष 2008 में राजस्थान के अनुराग सेवा संस्थान के अनुराग साहित्य सम्मान, वर्ष 2010 में विश्वममरा साहित्य पीठ सूकर क्षेत्र सोरों से राष्ट्र भारती सम्मान से सम्मानित हुए। साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें कई अन्य सम्मान भी मिले। राजस्थान के साहित्यिक मंडल नाथद्वारा ने उन्हें बृजभाषा विभूषण की उपाधि दी।
कवि डॉ. लवानिया की रचनाओं और लेखन की अनेक कृतियां प्रकाशित हुईं, जिनमें नाथगायन परंपरा, बृजरस, बृज बांसुरी, प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन, भारतीय पुलिस: संगठन एवं प्रशिक्षण, भारतीय पुलिस: एक सर्वेक्षण, भारतीय पुलिस: अतीत एवं संप्रति समाज प्रमुख हैं। डॉ. लवानिया ने कई कृतियों का संपादन भी किया है। इनमें पंचायतन उनकी अपनी ही संपादित त्रैमासिक पत्रिका शामिल है। इन-दिनों कवि डॉ. लवानिया वृद्धावस्था में हैं, लेकिन उनका हिंदी साहित्य समाज को निरोगी बनाने में सहायक बना हुआ है।