सहपऊ क्षेत्र के गांव मढ़ाका में आलू की फसल को जुतवाते किसान लाल सिंह। संवाद
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जिस फसल को खून-पसीने से औलाद की तरह पाला, आज उसी को अपनी आंखों के सामने मिट्टी में मिलाना पड़ रहा है। यह दर्द है गांव मढ़ाका निवासी किसान लाल सिंह का जिन्होंने आलू के गिरते दाम और कोल्ड स्टोरेज में जगह न मिलने से परेशान होकर अपनी पांच बीघा खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलवा दिया। देखते ही देखते महीनों की मेहनत मिट्टी में मिल गई।
लाल सिंह ने बताया कि एक बीघा आलू की खेती में करीब 25 हजार रुपये की लागत आती है, लेकिन इस समय बाजार में न तो खरीदार मिल रहे हैं और न ही व्यापारी भाव पूछने को तैयार हैं। ऐसे में खुदाई और ढुलाई का खर्च उठाना भी घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
स्थिति तब और खराब हो गई जब सादाबाद क्षेत्र के सभी कोल्ड स्टोरेज पहले से ही भरे मिले। कई दिनों तक चक्कर लगाने के बाद भी कहीं जगह नहीं मिली। मजबूरी में किसान को अपनी ही फसल उजाड़नी पड़ी।
भारी मन से फसल जुतवाने के बाद लाल सिंह ने कहा कि जब मेहनत का कोई मूल्य नहीं मिल रहा, तो उसे बचाने का भी कोई मतलब नहीं। उन्होंने कहा कि कम से कम यह मिट्टी में मिलकर खाद बन जाएगी, जिससे अगली फसल को फायदा होगा। किसान का यह भी कहना है कि अब वह भविष्य में कभी आलू की खेती नहीं करेंगे।