संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस।
राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह का इस जिले से गहरा नाता रहा है। हाथरस विधानसभा और सादाबाद विधानसभा क्षेत्र रालोद के गढ़ रहे हैं। अजित सिंह ने इस जिले में दर्जनों सभाएं कीं। हरित प्रदेश के आंदोलन को भी जिले में व्यापक समर्थन मिला था।
यही नहीं रालोद का यहां वर्ष 2009 में सांसद भी चुना गया। इससे पहले जब सादाबाद के उपचुनाव में वर्ष 2001 में लहटू ताऊ जीते तो एक तरह से तब रालोद को संजीवनी मिली थी। ऐसे में चौधरी अजित सिंह के निधन से लोगों में यहां भी गम का माहौल है।
जनपद के सृजन से पहले ही हाथरस और सादाबाद लोकदल का गढ़ रहा है। जाट लैंड सादाबाद और हाथरस मेें लंबे समय तक रालोद और उससे पहले लोकदल की तूती बोलती थी। चौधरी चरण सिंह के नाम पर यहां जाट एकजुट रहे और हाथरस विधानसभा क्षेत्र से चार बार कुं. रामशरण सिंह विधायक चुने गए।
वर्ष 2009 में भाजपा के साथ मिलकर रालोद ने हाथरस संसदीय सीट पर भी अपना कब्जा कर लिया। इतना ही नहीं इससे पहले जब चौधरी अजित सिंह ने हरित प्रदेश का आंदोलन चलाया और किसान कामगार पार्टी बनाई तो यहां कई बार वह आए। इस जिले में उनके आंदोलन को धार मिली।
डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के सचिव चौधरी हितेंद्र सिंह गुड्डू बताते हैं कि जब हरित प्रदेश का आंदोलन चल रहा था तो चौधरी अजित सिंह वर्ष 1998 में उनके लेबर कॉलोनी स्थित घर आए और वहां उन्होंने खाना खाया। इससे पहले वह किसी के घर नहीं गए थे। वह अपने संस्मरण सुनाते हुए बताते हैं कि चौधरी साहब बेहद खुशमिजाज व्यक्ति थे और वह कार्यकर्ता की बहुत इज्जत करते थे।
इसके बाद वह हरित प्रदेश के आंदोलन को लेकर गांव-गांव घूमे थे और सभाएं की थीं। वर्ष 2001 में भी सादाबाद के उपचुनाव में भी उन्होंने दर्जनों सभाएं की थीं। उन्होंने बताया कि चौधरी साहब ने रालोद से पहले किसान कामगार पार्टी का गठन किया था तो उन्हें मंडल अध्यक्ष का जिम्मा सौंपा था। यह जिम्मेदारी उन्होंने निभाई भी थी।
उनका कहना है कि देश ने एक ऐसा नेता खो दिया, जिसने हमेशा आम जनता की आवाज उठाई। इसी तरह रालोद नेता प्रमेंद्र गावर का कहना है कि वर्ष 2014 में जब चौधरी अजित सिंह जी के निवास को दिल्ली में खाली कराया गया तो दिल्ली में कार्यकर्ताओं ने जोरदार प्रदर्शन किया था। इसमें वह घायल हो गए थे।
तब चौधरी साहब उन्हें हाथरस में देखने भी आए थे। गावर ने बताया कि चौधरी साहब बेहद खुशमिजाज आदमी थे। किसानों और आम आदमी की समस्याओं को वह समझते थे। कई दलों से रालोद का गठजोड़ तो रहा, लेकिन कभी भी चौ. अजित सिंह ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। लोगों ने भी उनके निधन पर शोक जताया है।