अध्यक्ष विनीत आशना ने भी साहित्य के जरिए समाज को जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। हाथरस की धरती को साहित्य और संस्कृति की समृद्ध भूमि बताते हुए उपस्थित लोगों ने इस आयोजन की मुक्त कंठ से सराहना की।
इन कवियों ने पेश की शायरी
- निखत अमरोही ने पढ़ा अपनी गुमनाम कहानी नहीं होने दूंगी, खुद को मैं दूसरी रानी नहीं होने दूंगी।
- मध्यम सक्सेना ने कहा दिन बनाने में रात लगती है, तुमको यह बात आसान लगती है।
- जिया नामा ने भाव व्यक्त किए उसे लगता है हम मुश्किलों को झेल लेंगे, खुदा हम जैसों पर कितना भरोसा कर रहा है।
- फैज कुमार ने पढ़ा पहले तो प्यार करने के काबिल बना दिया, फिर पत्थर सा दिल क्यों बना दिया।
- राशीद राहत ने कहा यूं तो कितने सारे लोग हैं दुनिया में, कुछ लोगों से मिलता हूं तो लगता है कितने प्यारे लोग हैं दुनिया में।
- नवीन नीर ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा जिन्हें तमीज नहीं धूप खर्च करने की, सुना है जेब में वह आफ़ताब रखते हैं।
- अमित शुक्ला ने कहा प्यास क्या उसको तो पानी चाहिए, शर्म तो दरिया को आनी चाहिए।
- जुनैद अख्तर ने पढ़ा कातिल गवाह बनकर अदालत में आ गए, मुझ पर मेरे कत्ल का इल्जाम लगा गए।
- नितिन मिश्रा ने भक्ति रस में कहा लिखो श्रीराम दिल में है अगर भव पार की चाह, लिखे श्रीराम के पत्थर भी जल में तैर जाते हैं।