हाथरस। मातृ छाया साधना केंद्र ऐसे बच्चों का घर और स्कूल है, जहां उन्हें रिटायर्ड शिक्षिका संतोष शर्मा रूपी मां के आंचल की छाया मिलती है। वे अपनी कोख से जन्मे बेटे और बेटी के पास तो नहीं रहती हैं, लेकिन इनसे दूर होकर भी वह परेशान नहीं हैं। यहां रह रहे बच्चे भी इनमें अपनी मां का रूप ही देखते हैं।
शहर के एक छोर पर मातृ छाया साधना गुरुकुल स्थित है। इसमें 70 बच्चों की परवरिश से लेकर पढ़ाई तक होती है। यहां जिन बच्चों की परवरिश हो रही है उनमें मिजोरम, असम, मेघालय, मध्य प्रदेश, त्रिपुरा आदि राज्यों के हैं। इनमें ज्यादातर आदिवासी हैं। इस मातृछाया साधना गुरुकुल की नींव शहर के समाजसेवी प्रेमनारायण वैद्य ने रखी, लेकिन अब इसकी जिम्मेदारी रिटायर्ड शिक्षिका संतोष शर्मा (68 वर्ष) बखूबी निभा रही हैं। जिस समय यह केंद्र खोला गया, उस समय यहां केवल 8 बच्चे थे, जो अनाथ थे। अब यहां 70 बच्चे घर-परिवार से दूर रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। शहर के आरसी इंटर कॉलेज से 2002 में रिटायर होने के बाद संतोष शर्मा ने अपना जीवन इन बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा में ही समर्पित कर दिया। उनका एक बेटा दिल्ली में है, जबकि बेटी भोपाल में रहती है। रिटायर शिक्षिका का घर-परिवार सब कुछ अब यह शिक्षा केंद्र ही है। इस मातृ छाया साधना केंद्र पर कक्षा 8 तक की पढ़ाई होती है। कई बच्चे यहां से निकलकर अब अब बाहर पढ़ाई कर रहे हैं। प्रधानाध्यापिका संतोष शर्मा काा कहनाहै कि बच्चे देखते में मुझमें मां का रूप इन बच्चों के लालन-पालन और शिक्षा में मुझे ऐसा महसूस होता है, जैसे मैं अपने बच्चों के बीच में हूं। मैं खुद रिटायर शिक्षिका हूं। मेरे जीवन का लक्ष्य है कि जब तक हो सके, यहां के बच्चोें की परवरिश करूं। बच्चों को मां जैसा दुलार दूं। हालांकि मैं अपने बेटे-बेटी के यहां कुछ दिनों के लिए जाती हूं, लेकिन मुझे यहां के बच्चों की चिंता सताती रहती है। बच्चे भी मुझमें अपनी मां का ही रूप देखते हैं।