हाथरस। इस संसदीय सीट पर बसपा के वोट बैंक में इस बार सेंधमारी के प्रयास चल रहे हैं। सपा, भाजपा, रालोद अपने फार्मूले अपना कर यह कोशिश कर रहे हैं कि बसपा को इस वोट बैंक को तोड़कर अपने पाले में किया जाए। वैसे बसपा नेता यहां आश्वस्त हैं कि उसका परंपरागत वोटर टस से मस नहीं होगा। इस संसदीय क्षेत्र में अनुमान के हिसाब से साढ़े तीन लाख से ज्यादा जाटव मतदाता हैं। बसपा इसे अपना ठोस वोटर मानती है और इसके सहारे पिछले कई लोकसभा चुनाव में पार्टी यहां भाजपा और उसके सहयोगी को कड़ी चुनौती पेश करती आई है। पार्टी ने वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भी इस संसदीय क्षेत्र की दो सीटों पर कब्जा किया था। इसमें हाथरस और सिकंदराराऊ सीट शामिल हैं। विधानसभा चुनाव में पार्टी के इस प्रदर्शन के पीछे भी बसपा का यह ठोस वोट बैंक ही है। बात यदि इस संसदीय चुनाव की करें तो इस बार दूसरे दल यह प्रयास कर रहे हैं जाटव मतदाताओं को अपने खेमे में खींचा जाए। इसमें सपा तेजी से लगी हुई है। सपा ने इस बार पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजीलाल सुमन को अपना उम्मीदवार बनाया है। वह चार बार सांसद रह चुके हैं। राजनीति के पुराने खिलाड़ी रामजीलाल सुमन और उनके समर्थकों की कोशिश है कि सुमन के नाम पर जाटवों को सपा से जोड़ा जाए। जाति के लोगों को यह बात बताई जाए कि सुमन भी उनकी जाति के हैं और केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। इसके लिए जाटव समाज के कुछ नेताओं को साथ ले भी लिया गया है और वह यहां इसमें जुटे भी हैं। सपा के इन नेताओं को उम्मीद है कि जाटव मतदाता इस चुनाव में उन्हें सपोर्ट करेंगे। भाजपा और रालोद से भी इस तरह के प्रयास हो रहे हैं। दोनों पार्टियां अपनी पार्टी से जुड़े कुछ चेहरोें को दिखाकर जाटव मतदाताओं पर डोरे डालने की कोशिश कर रही हैं। इन दोनों दलों के नेता भी इस पर गंभीरता से मंथन कर रहे हैं कि चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने वाले इस जाति के मतदाताओं को किस तरह लुभाया जाए। वहीं बसपा नेताओं की सोच अलग है। सूत्रों के मुताबिक उसका मतदाता कहीं हिलेगा भी नहीं। वह उन्हीं की पार्टी को वोट देगा। भले ही कोई और दल कितना भी प्रयास कर ले। यही नहीं पार्टी के नेताओं का मानना है कि यदि पार्टी सुप्रीमो बहन मायावती की सभा यहां हो गई तो फिर उसके वोटर को दूसरा खेमा नहीं खींच सकता। अन्य दलों की सारी तैयारियां धरी रह जाएंगी।