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ढाई दशक बाद उपाध्याय परिवार का कोई सदस्य नहीं उतरा है चुनाव मैदान में

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस।
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करीब ढाई दशक में पहली बार ऐसा होगा कि बसपा के कद्दावर नेता और पूर्व ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय या उनके परिवार का कोई सदस्य इस बार चुनाव मैदान में नहीं होगा। वर्ष 1993 से लेकर अब तक रामवीर उपाध्याय अथवा उनके परिजन लगातार विधानसभा और लोकसभा से लेकर निकाय चुनाव लड़ते रहे हैं।

इस बार सीमा उपाध्याय ने खुद फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ने से मना कर दिया। ऐसे में चुनावी माहौल में उपाध्याय से समर्थक निराश दिखाई दे रहे हैं। वहीं रामवीर उपाध्याय का कहना है कि इस बार उन्होंने पहले ही यह फैसला कर लिया था कि वह चुनाव लड़ेंगे नहीं, बल्कि चुनाव लड़ाएंगे।
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उल्लेखनीय है कि रामवीर उपाध्याय ने वर्ष 1993 में हाथरस विस सीट से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा। उसमें वह तीसरे स्थान पर आए। तदुपरांत वर्ष 1996 में वह बसपा के उम्मीदवार के रूप में हाथरस सीट से ही विधानसभा का चुनाव लड़े। काफी वोटों से जीते और प्रदेश में ऊर्जा व परिवहन मंत्री बने।

तदुपरांत उनकी पत्नी सीमा उपाध्याय हाथरस से जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ीं और जीती। उपाध्याय फिर लगातार वर्ष 2002, 2007 से हाथरस से विधायक का चुनाव लडे़ और जीते। वर्ष 2012 में वह सिकंदराराऊ से चुनाव लड़े और वहां से जीते। वर्ष 2017 में उन्होंने फिर सीट बदली और उन्होंने सादाबाद से चुनाव लड़कर विजय हासिल की।

बात यदि लोकसभा चुनाव की करें तो वर्ष 2004 में उन्होंने जलेसर उन्हें बसपा ने जलेसर सीट से चुनाव लड़ाया, लेकिन लोस चुनाव वह नहीं जीत सके। इस चुनाव में एसपी सिंह बघेल ने बाजी मारी थी। तदुपरांत वर्ष 2009 में उनकी पत्नी सीमा उपाध्याय फतेहपुर सीकरी से चुनाव लड़ी थीं और वहां राजबब्बर को हराकर चुनाव जीती थीं।

पिछला लोकसभा चुनाव भी वह फतेहपुर सीकरी से लड़ी थीं, लेकिन उस चुनाव में वहां से बाबूलाल विजयी रहे थे। इस बार सीमा उपाध्याय को ही बसपा ने पहले अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था, लेकिन सीमा उपाध्याय ने एकाएक टिकट वापस कर सभी को चौंका दिया था। ऐन वक्त तक यह चर्चा होती रही कि रामवीर अथवा सीमा उपाध्याय भाजपा में शामिल हो सकते हैं, लेकिन यह चर्चाएं महज अफवाह ही निकलीं।

रामवीर के भाई मुकुल उपाध्याय इगलास में उप चुनाव लड़े और जीते। उसके बाद हालांकि वह अगला चुनाव हार गए। तदुपरांत वह एमएलसी का चुनाव जीत गए। वर्ष 2014 में मुकुल ने गाजियाबाद से बसपा से ही लोस चुनाव लड़ा था, लेकिन वह वहां से हार गए थे। उसके बाद वर्ष 2017 में वह शिकारपुर से बसपा से विस चुनाव लड़े, लेकिन वहां से भी उन्हें सफलता नहीं मिली।
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रामवीर के दूसरे भाई विनोद उपाध्याय ने भी डिबाई से विस चुनाव लड़ा, लेकिन वहां से उन्हें सफलता नहीं मिली। मुकुल उपाध्याय ने इस बार भाजपा का दामन थाम लिया था और अलीगढ़ से टिकट मांगी थी, लेकिन भाजपा ने उन्हें वहां से प्रत्याशी नहीं बनाया। स्थानीय निकाय चुनाव भी उपाध्याय परिवार के कई सदस्य लगातार लड़ते रहे हैं और निर्वाचित होते रहे हैं। ऐसे में लंबे समय बाद ऐसा कोई चुनाव होगा, जिसमें उपाध्याय परिवार का कोई सदस्य मैदान में नहीं होगा।
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