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उथल-पुथल के बीच सभी दल लगे रहे लोकसभा चुनाव 2019 की तैयारी में

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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हाथरस। जिले की राजनीति में इस साल उथल-पुथल होती रही। इस साल कोई चुनाव तो नहीं हुआ लेकिन सभी दल मिशन 2019 की तैयारी में जुटे रहे। राजनेताओं ने अगले साल होने वाले चुनाव को लेकर अपनी नींव मजबूत की। सभी दलों के बसपा में इस साल कई नेताओं को पार्टी से बाहर निकाला गया तो भाजपा ने भी अपना जिलाध्यक्ष बदला। पूर्व एमएलसी मुकुल उपाध्याय का अपने ही भाई पूर्व ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय के खिलाफ विद्रोह करना इस साल खासा सुर्खियों में बना रहा। प्रमुख राजनीतिक दलों में गुटबाजी हावी रही और समय-समय पर यह सामने भी आई।

पिछले साल विधानसभा चुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव हुए थे । ऐसे में इस साल वर्ष 2018 में कोई चुनाव तो नहीं हुआ, लेकिन सभी राजनीतिक दल वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटे रहे। इसी को लेकर काम होता रहा और प्रमुख राजनीतिक दलों के टिकट के दावेदार यहां से तैयारी करते रहे। यदि जिले में राजनीतिक दलों में देखें तो इस साल बसपा द्वारा पूर्व एमएलसी मुकुल उपाध्याय का निष्कासन यहां काफी सुर्खियोें में रहा। उसके बाद जब मुकुल उपाध्याय ने अपने भाई और बसपा के दिग्गज नेता रामवीर उपाध्याय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया तो यह भी काफी बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम माना गया।
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मुकुल ने अपने भाई व भाभी के खिलाफ मोर्चा खोलकर अपने भाजपा में जाने के संकेत दिए, लेकिन उन्होंने इसकी विधिवत घोषणा नहीं की। इस पर काफी समय तक लोगों की टकटकी लगी रही। बसपा हाईकमान ने इस साल कई जिलाध्यक्ष बदले। जिले में सितंबर माह में महेशबाबू कुशवाहा को पार्टी जिलाध्यक्ष बनाया गया। उनसे पहले बीडी सिंह बसपा के जिलाध्यक्ष बने। इसी साल रामवीर सिंह ऊसवा को भी कुछ समय के लिए हाथरस जिले की कमान बसपा नेतृत्व ने सौंपी। बसपा ने इस साल पार्टी के प्रत्याशी रहे बृजमोहन राही के अलावा दिनेश देशमुख, लल्लनबाबू को भी पार्टी से बाहर निकाला। बसपा ने इस सीट से पिछला लोकसभा चुनाव लड़े मनोज सोनी को आगरा सुरक्षित क्षेत्र से प्रभारी घोषित कर दिया।


बात यदि भाजपा की करें तो भाजपा ने इस साल जिले की कमान युवा चेहरे गौरव आर्य को सौंपी। गौरव आर्य से पहले यहां रामवीर सिंह परमार जिलाध्यक्ष थे। नगर नेतृत्व में भी इस साल परिवर्तन हुआ। पार्टी में अन्य विंगों में भी परिवर्तन हुए। हाथरस संसदीय सीट वर्ष 2014 में भाजपा ने जीती थी। ऐसे में भाजपा मिशन 2019 को लेकर पूरे साल जोर-शोर से जुटी रही। पार्टी के कई बड़े आयोजन भी हुए। कई मौकों पर भाजपा की गुटबंदी परोक्ष रूप से सामने आई। भाजपा में वह नेता काफी ज्यादा सक्रिय दिखे, जोेकि लोकसभा चुनाव के लिए टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। साल के अंत में पांच राज्यों में चुनाव हारने से भाजपाई मायूस भी दिखे। बात यदि कांग्रेस की करें तो कांग्रेस में इस साल जिला व नगर स्तर पर तो पार्टी में कोई परिवर्तन नहीं हुआ लेकिन पार्टी ने भी अगले साल चुनाव की तैयारी में अपने आप को यहां भी काफी सक्रिय रखा। उपचुनाव में तीन राज्यों में मिली जीत ने यहां भी कांग्रेसियों को खासा उत्साहित कर दिया। इस जीत के साथ कांग्रेसी और ज्यादा जोर-शोर से अगले साल होने लोस चुनाव की तैयारी में जुट गए। हालांकि साल के अंत में सपा-बसपा और रालोद के गठबंधन के साथ यूपी में कांग्रेस को शामिल न करने पर कांग्रेसी थोड़े मायूस भी दिखाई दिए।
सपा ने यहां भी पार्टी हाईकमान के निर्देश पर इस साल समय-समय पर सरकार विरोधी आंदोलन किए। सपा के कुछ नेता इस बार शिवपाल यादव द्वारा बनाई गई प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया में शामिल हो गए। सपा और बसपा कार्यकर्ताओं की नजर इस साल अंत तक इस पर रही कि आखिर यह सीट सपा के खाते में जाएगी या बसपा के। सपा के व
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रिष्ठ नेता रामजीलाल सुमन सक्रिय रहे और बसपा के टिकट के दावेदार मनोज सोनी को आगरा का प्रभारी बनाए जाने से यह चर्चा होती रही कि गठबंधन में सपा इस सीट से चुनाव लड़ सकती है। जिले के महत्वपूर्ण पद जिला पंचायत अध्यक्ष पद सपा जिलाध्यक्ष ओमवती यादव पूरे साल काबिज रही और उन्हें विनोद उपाध्याय आदि की ओर से चुनौती मिलती रही। रालोद व अन्य कई दल भी अगले साल होने वाले चुनाव की तैयारी में जुटे रहे। इन दलोें ने वरिष्ठ नेताओं ने भी यहां आकर कार्यकर्ताओं को उत्साहित किया।
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