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आजादी के लिए 32 साल देश से निर्वासित रहकर लड़ी लड़ाई आर्यन पेशवा ने

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न्यूज डेस्क अमर उजाला हाथरस
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हाथरस। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा, देश की आजादी के लिए 32 साल तक विदेश में रहकर संघर्ष करने वाले राजा महेंद्र प्रताप के दिल में इसी तरह का जज्बा और जुनून था। उन्होंने वर्ष 1915 में ही हिंद सरकार की स्थापना कर दी। यह अलग बात है कि देश 1947 में अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ।

राजा महेंद्र प्रताप का जन्म मुरसान नरेश बहादुर घनश्याम सिंह के यहां एक दिसंबर 1886 को हुआ था। बाद में उन्हें हाथरस नरेश राजा हरनारायण ने गोद ले लिया था। मात्र 20 साल की अवस्था में पिता का देहांत होने के बाद हाथरस विरासत पर राजा महेंद्र प्रताप की ताजपोशी हुई, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप के विचार शुरू से ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ थे।
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यहीं कारण था कि अंग्रेजों ने उन्हें राजा बहादुर की उपाधि नहीं दी। राजा साहब हमेशा यह सोचते थे कि क्यों न यह मुल्क अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो। वर्ष 1914 में जब पूरा यूरोप पहले विश्व युध्द की आग में जल रहा था, तब उन्होंने योजना बनाई कि क्यों न विदेश जाकर देश के स्वाधीनता आंदोलन को मजबूती प्रदान की जाए। वह इस सिलसिले में देहरादून में पुरुषोत्तम दास टंडन से भी मिले।

देहरादून से ही राजा महेंद्र प्रताप आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। जीवन के 32 साल तक वह देश से निर्वासित रहे और आजादी की लड़ाई लड़ते रहे। पहले विश्व युद्ध के दौरान जर्मन में निर्वासित भारतीय राजनेताओं में उनका विशिष्ट स्थान था। 10 फरवरी 1915 को वह मोहम्मद पीर के छद्म नाम से स्विट्जरलैंड होते हुए बर्लिन पहुंचे। वह जर्मनी की मदद से अंग्रेजी हुकूमत को मात देना चाहते थे। यही नहीं जर्मनी पहुंचने पर वहां से अधिपति विल्हैम द्वितीय ने उनका जोशीला स्वागत किया। वह इस दौरान वहां के सम्राट विलियम केसर से भी मिले।

दो महीने बाद वह अफगानिस्तान चले गए और काबुल पहुंचे। पूरी योजना के अनुसार उन्होंने एक दिसंबर 1915 को काबुल में आजाद हिंद सरकार की स्थापना कर दी। इस सरकार ने अफगानिस्तान से राजकीय स्तर पर संबंध स्थापित कर लिए। उन्होंने वहीं से पूरा सरकारी ढांचा खड़ा किया। राजा साहब के सचिवालय में दो दर्जन से ज्यादा सचिव थे। हालांकि पहले विश्व युद्ध में अंग्रेजों की जीत के चलते वह काफी व्यथित हुए। उसके बाद अफगान सरकार ने उन्हें काबुल से हटाकर मजार शरीफ भेज दिया। वहां उन्होंने रूसी सरकार से राजनयिक संबंध स्थापित करने के प्रयास किए। राजा महेंद्र प्रताप जहां भी गए, आजादी के लिए संघर्ष करते रहे। 1925 में वह अमेरिका के कैलीफोर्निया आए।

वहां कुछ अप्रवासी भारतीयों की मदद से वह जापान पहुंचे। वहां भी उन्होंने विदेश में रह कर आजादी की योजना बनाई। वहां उन्होंने संस्था बनाई। इसके वह स्वयं इसके प्रधान और रास बिहारी बोस उप प्रधान थे। दूसरे विश्व युद्ध के समय वह जापान में ही मौजूद थे। जब जापान इसमें पराजित हुआ तो वह युद्धबंदी बना लिए गए। चार फरवरी 1946 को उनकी जेल से रिहाई हुई। उसके बाद जब वह 31 साल सात महीने निर्वासित रहने के बाद अपने वतन लौटे तो जोरदार स्वागत हुआ। देश में आने के बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल उन्हें सेवाग्राम आश्रम ले गए। वहां गांधी जी से भी मुलाकात हुई। आजादी के इस योद्धा ने 1957 से लेकर 1962 तक मथुरा लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1979 में उनका इंतकाल हो गया।
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अटलबिहारी को हराया था चुनाव में
आर्यान पेशवा समाज सुधारक भी थे। उन्होंने एएमयू की स्थापना के लिए जमीन भी दान की थी। यही नहीं वर्ष 1909 में उन्होंने वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की। यह तकनीकी शिक्षा का एक केंद्र था। उन्होंने प्रेम धर्म भी चलाया और इसी नाम से एक राष्ट्रीय पत्र भी निकाला। आजादी के बाद राजा साहब ने कई चुनाव भी लड़े। राजा साहब ने वर्ष 1957 में लोकसभा चुनाव में पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को मथुरा से चुनाव भी हरा दिया था। इस चुनाव में अटल जी की जमानत भी जब्त हो गई थी।
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राजा साहब को भारत रत्न देने की मांग
उनकी यादों को संजोकर रखने की बात करें तो भारत सरकार ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया है और नगर पालिका यहां उनके नाम से एक मार्केट बना चुकी है, लेकिन आजादी की इतनी बड़ी जंग लड़ने वाले इस योद्धा की स्मृति के लिए यह नाकाफी है। समाजसेवी शैलेंद्र वार्ष्णेय सराफ और अनिल वार्ष्णेय आदि ने डीएम को ज्ञापन देकर मांग की है कि आजादी के इस योद्धा को भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित किया जाए। उनकी जयंती और पुण्यतिथि शासन द्वारा मनाई जाए। हाथरस शहर के मुख्य चौराहे पर उनकी प्रतिमा स्थापित की जाए। जयंती पर एक दिसंबर को सरकारी अवकाश घोषित किया जाए। उनके नाम से स्कूल खोले जाएं और योजनाओं के नाम उनके नाम से किए जाएं।
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