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हम अपनी सतह से गिर ही नहीं सके वरना...

Thu, 09 Mar 2017 11:44 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला हरदोई
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नुमाइश मेले में मुशायरे में कलाम पेश करते लखनऊ से आए शायर वासिफ फारूकी। - फोटो : Amar ujala
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नुमाइश मेले में बुधवार रात हुए मुशायरे में शायरों ने मोहब्बत और वतनपरस्ती का संदेश दिया तो महिला दिवस पर मां और खाक-ए-वतन की तारीफ की। शेर-ओ-गजल की इस महफिल में तीन शायराओं ने मुहब्बत के ऐसे कलाम पेश किए कि बादल भी पिघलने को मजबूर हो गए।
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श्री रामलीला कमेटी की ओर से आयोजित मुशायरे का आगाज एटा के मुजाहिद मकसूदपुरी ने किया। उन्होंने गमे जहां से हमें रोशनास रहने दे, जहां भर की खुशी अपने पास रहने दे, जो तशना लब हैं पिला तू उन्हेें मये उल्फत, हमारे हाथ में खाली गिलाश रहने दे, गजल पेश की।

 शायरों की महफिल में चार चांद लगाने आए डॉ. वसीम बरेलवी ने अपनी शायरी कुछ यूं पेश की..हम अपनी सतह से गिर ही नहीं सके वरना, बहुत से लोग हमारे भी साथ हो जाते...। अलीगढ़ से आए शायर कलीम समर ने अपने शायराना अंदाज से सभी को खूब गुदगुदाया। कहा कि कह रहा था कल दरोगा थाने में दीवान से, आ गए कल्लन के पैसे छोड़ दो सम्मान से...को सुनकर लोग हंसते हंसते मौजूदा हालात पर सोचने को विवश हो गए। शायर मो. अली साहिल ने अपनी शायर को कुछ यूं पढ़ा कि मुहब्बतें मेरा मकसद है, इश्क मेरा जुनून, जो नफरतों से बदल जाए ऐसी साख नहीं, वतन परस्ती के जज्बे से है मेरी पहचान, अब इस शिनाख्त से बढ़कर कोई शिनाख्त नहीं...। नज्म को सुनकर तालियों की गड़गड़ाहट से पंडाल गूंज उठा। लखनऊ से आए वासिफ फारूकी की शायरी आज फिर सोच के रख दी है कि अब कल होगी, जाने कब तक तेरी तस्वीर मुकम्मल होगी..को सुनकर दर्शक वाह वाह कह उठे।
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रामपुर से आए डॉ. शायर ताहिर फराज ने नाम उसका खुदा या राम है, हमको तो बस बंदगी से काम है, शेर से सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दिया और तेरा मन अमृत का प्याला, तू ही काबा तू ही शिवाला शेर से मां की मोहब्बत की तारीफ की।  

दिल्ली से आए इकबाल अशहर बोेले कैसी तरतीब से कागज पे गिरे हैं आंसू, एक भूली हुई तस्वीर उभर आई है..को सुनकर लोग न सिर्फ संजीदा हो गए बल्कि वाह वाह कह उठे। लखनऊ से आई डा. नसीम निकहत कुछ यूं बोली..न उसे खबर न मुझे खबर, वो किधर गया मैं किधर गई, कोई पंखुड़ी थी गुलाब की, जो ख़िज़ा रूतों में बिखर गई...। एटा से आए मुजाहिद मकसूदपुरी बोेले कि गम-ए-जहां से मुझे रोशनास रहने दे, जहां भर की खुशी अपने पास रहने दे, जो तशना लब हैं पिला तू उन्हें गमे उल्फ त, हमारे हाथ में खाली गिलास रहने दे ..को सुनते ही तालियों की गूंज पूरे पंडाल से निकलने से बेकरार दिखी।

गुलसबा फ तेहपुरी ने कहा कि तुम अपने इश्क का इजहार मत कभी करना, जो दिल में डर है तो फिर प्यार मत करना..। शाइस्ता सना कानपुरी ने अपनी नज्म प्रस्तुत करते हुए कहा कि हौसलों ने बहुत साथ मेरा दिया, दिल न चाहा मगर मुस्कुराना पड़ा। सामना तेरा रूसवाइयों से न हो, इसलिए आंसुओं को छुपाना पड़ा...सभी का दिल जीत लिया। ग्वालियर से आए मदन मोहन दीक्षित ने शायरी पेश करते हुए कहा कि ये कहां की रीत है, जागे कोई, सोए कोई, रात सबकी है तो सबको नींद आनी चाहिए...खूब तालियां बंटोरी।
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