पिहानी को वजूद देने वाले बाबा सदर जहां का उर्स
रविवार को धूमधाम से मनाया गया। उर्स पर रौजा मैदान में लगे मेले में
बच्चों ने जमकर मस्ती काटी। बाबा सदर जहां और उनके भाई बदर जहां की कब्रों
पर चादरें चढ़ाने और मन्नतें मानने का सिलसिला भी रात होने तक जारी रहा।
शाम
को मजार पर चरागां किया गया। इतिहास में दर्ज मान्यता के अनुसार, कि सन्
1540 ई में हुमायूं और शेर शाह सूरी के बीच हुई जंग में हुमायूं की हार के
बाद लश्कर इधर उधर बिखर गया। नवाब सदर जहां इसी जगह (पिहानी) में आकर छिपे
थे, जहां पहले जंगल था।
हुमायूं के दोबारा तख्त नशीन होने पर यह जमीन नवाब
सदर जहां को जागीर मेें मिली तो उन्होंने इस स्थान पर नगर आबाद किया और
पिन्हानी (छिपने की जगह) नाम रखा, जो अब पिहानी के नाम से जाना जाता है।
उनके इंतकाल के बाद उनके बेटे ने छोटी पिहानी और बड़ी पिहानी के बीच उनके
रौजेे का निर्माण कराया।
इस पर प्रतिवर्ष जेठ माह में मेला और उर्स उनके
जमाने से होता आ रहा है। रविवार को भी बाबा के उर्स और मेले में बच्चों ने
खाने-खिलौनों की दुकान और झूलों पर जमकर लुत्फ उठाया। अकीदमंदों की कतारें
पूरा दिन रौजे पर लगीं रहीं। महिला-पुरुष अकीदतमंदों ने कब्र पर हाजिरी
देकर चादर चढ़ाई, चरागां किया और मन्नतें मानीं।
यह सिलसिला रात होने तक
जारी रहा। हिंदू-मुसलिम एकता के प्रतीक इस प्राचीन उर्स और मेले मेें
मुसलिमों के साथ अन्य धर्मों के अकीदतमंदों ने भी चढ़ावा चढ़ाकर बाबा सदर
जहां से अपनी अकीदत का इजहार किया।