एक समय ऐसा भी आया जब भगवान कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को श्राप दे दिया कि तुम पूरे जीवन दरिद्र ही रहोगे क्योंकि दरिद्र से बढ़कर संसार मे कोई दु:ख नहीं है। सुदामा अपनी भूल को स्वीकार करते हुए श्राप नहीं बल्कि वरदान समझकर स्वीकार कर लिया।
शहर के विष्णुपुरी मोहल्ले में चल रही भागवत कथा के अंतिम दिन गुरुवार को कथा व्यास अक्षयानंद महाराज ने सुदामा चरित्र की कथा का वर्णन किया। भक्तों को बताया कि सुदामा पोरबंदर के रहने वाले थे।
उज्जैन नगर में भगवान श्रीकृष्ण के साथ संदीपन गुरु से शिक्षा प्राप्त की थी। एक दिन गुरु माता ने यज्ञ की समिधा लेने के लिए सुदामा और कृष्ण को वन में लकड़ी लेने भेजा। चलते समय चार मुट्ठी चने सुदामा को दे दिए।
कहा कि भूख लगने पर दोनों लोग मिलकर चने खा लेना। सुदामा मन में दरिद्र भाव आ गया। सुदामा ने भगवान को न बताकर स्वयं चना खाना शुरू कर दिया। इससे कृष्ण कुपित होकर सुदामा को श्राप दे दिया।
कहा कि तुम मेरे मित्र हो और परम ज्ञानी हो। फिर भी मन के अंदर दरिद्र भाव कैसे आ गया। जाओ जीवन भर दरिद्र ही रहोगे। जब भगवान कृष्ण की कृपा से उनको प्रेरणा मिली तब सुदामा उसी प्रकार से चार मुट्ठी चावल लेकर द्वारिका गए। सुदामा को देखते ही भगवान नंगे पांव दौड़कर सुदामा से लिपट कर रोने लगे।
भगवान कृष्ण सुदामा को महल ले जाकर सुदामा के पैरों को आंसूओं से धोया। भगवान सुदामा के चावल नहीं बल्कि उनकी दरिद्रता को चबा गए। सुदामा ने भगवान से धन संपत्ति स्वर्ग मुक्ति न मांग कर बल्कि यह मांगा कि हमारी आपकी मित्रता हर जन्म में बनी रहे। अर्थात जीवात्मा और परमात्मा की मित्रता सदैव बनी रहे।
यही जीवन का आनंद है। इस मौके पर ईश्वर चंद्र मिश्रा, पवन मिश्रा, पीयूष मिश्रा, किरन त्रिपाठी, समता त्रिवेदी, रश्मि मिश्रा, ममता त्रिवेदी आदि श्रद्धालु मौजूद रहे।