रहमत और बरकत का महीने रमजान के यह रोजे बंदों के लिए किसी इम्तहान से कम
नहीं हैं। शुक्रवार को पहले रोजेे पर जुमा की नमाज के लिए भारी संख्या में
मुसलिमों की भीड़ उमड़ी। इस दौरान उलमा- ए-कराम ने रोजा, तरावीह और जकात
आदि से इबादतों की अहमियत बयान करते हुए रमजान के रोजे रखने और इस दौरान
तमाम बुराइयों से बचने की सलाह दी।
जामा मसजिद
में मौलाना सुलेमान साहब ने जुमा की नमाज से पूर्व तकरीर फरमाते हुए कहा कि
रमजान अल्लाह की खुशनूदी हासिल करने का महीना है। इस माहे मुबारक के रोजे
हमें गरीबों की भूख और प्यास का अहसास करवा कर उनके साथ हमदर्दी का पैगाम
देते हैं।
एक रिवायत के अनुसार, अल्लाह के नबी ने शाबान को अपना महीना कहा
और रमजान को खुदा का महीना बताया था। हमें अल्लाह के इस महीने की कद्र करनी
चाहिए और ज्यादा से ज्यादा इबादतें कर अल्लाह को राजी कर लेना चाहिए। इस
महीने में बुराइयों से बचने का भी खास एहतमाम करने की जरूरत है।
मसजिद
इस्लामगंज में मौलाना उसमान गनी मजाहिरी ने तकरीर फरमाते हुए कहा कि रोजे
का मतलब अल्लाह के हुक्म पर भूख और प्यास की तकलीफ बर्दाश्त करना और नफ्स
से जिहाद है। उन्होंने कहा कि रोजे की हालत में भूख प्यास की शिद्दत को
बयान करने के बजाय सब्र और शुक्र का रवैया अपनाएं।
अल्लाह सब कुछ जानने
वाला है और रोजे का बदला उसने स्वयं देने का वादा किया है। इसी तरह मसजिद
फारूके आजम, मसजिद सैयदना उसमाने गनी और सैयना सिद्दीके अकबर आदि में भी
नमाज अदायगी को बड़ी संख्या में रोजेेदार जुटे। नन्हें नमाजी भी इस मौके पर
मौजूद थे।