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धर्म : रामलीला ...

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हरदोई/पाली। नवरात्र की शुरूआत होने के साथ ही अलग-अलग जगहों पर रामलीलाओं का आयोजन भी शुरू हो गया है। पाली के रामलीला मैदान पर चल रही रामलीला के पात्रों की कहानी कुछ अलग है। पिता राम की भूमिका निभाते थे तो ताऊ रावण बनते थे। ताऊ के साथ मेघनाथ और अहिरावण की भूमिका निभाने वाले योग शिक्षक अब रावण की भूमिका में नजर आते हैं।
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पाली नगर के मोहल्ला सुलह सरॉय के रहने वाले प्रदीप अवस्थी यूं तो योग शिक्षक हैं लेकिन खेती ही उनका मुख्य कार्य है। रामलीला के मंचन में वह रावण की भूमिका निभाते हैं। उनके पिता देव नारायण अवस्थी पाली की ही रामलीला में 60 साल पहले तक राम की भूमिका निभाते थे। देव नारायण के बड़े भाई और प्रदीप के ताऊ हरिनारायण अवस्थी रावण का रूप धरते थे, दोनों का निधन हो चुका है।
प्रदीप के चाचा वेद अवस्थी रामलीला में लगभग 50 वर्ष तक हनुमान का किरदार निभाते रहे। पिछले वर्ष हुई रामलीला में भी वह हनुमान बने थे। इस बार शरीर शिथिल पड़ जाने के कारण फिलहाल रामलीला के मंचन से दूर हैं। हरिनारायण के साथ अहिरावण और मेघनाथ का किरदार निभाने वाले प्रदीप अब रावण का किरदार निभाने लगे हैं।
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दिन में गायों की सेवा, शाम को सीता का किरदार
पाली की रामलीला में सीता का किरदार फर्रुखाबाद के कड़हर बांकापुरवा के रहने वाले घनश्याम तिवारी निभाते हैं। वह माता-पिता के निधन के बाद से पाली के मोहल्ला खारा कुआं में अपनी बुआ के साथ रहते हैं। पिछले पांच साल से सीता का किरदार निभाने वाले घनश्याम ने पांच गाय पाल रखी हैं। दिन में वह इन गायों के लिए चारा पानी की व्यवस्था करते हैं और रामलीला होने पर शाम को मंचन के लिए पहुंच जाते हैं।

लकड़ी की मशाल जलाकर होती थी रोशनी अब हाईमास्क लाइटें
पाली की रामलीला लगभग 170 साल पुरानी है। पाली नगर पंचायत के पहले अध्यक्ष करण सिंह चौधरी ने मेले की शुरूआत की थी। तब लकड़ी में आगे कपड़ा बांधकर मशाल जलाकर रोशनी की जाती थी। इसी रोशनी के बीच रामलीला का मंचन होता था। इसके बाद पेट्रोमैक्स की रोशनी में रामलीला हुई और अब आधुनिक दौर में हाईमास्ट लाइटों के बीच रामलीला होती है।
नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष कमला कांत वाजपेयी आयोजन समिति के मंत्री हैं। इन्हीं की देखरेख में रामलीला का मंचन और मेले का आयोजन होता है। वह बताते हैं कि शुरूआत में नगर से एक-एक रुपये लेकर मेले का गेट बनवाया और मंच तैयार कराया। इसी मंच पर रासलीला होती है। 20 साल पहले तक चंदे से मेला होता था लेकिन अब चंदा नहीं लिया जाता। मेला और रामलीला कमेटी के नाम से बिजली का कनेक्शन भी हो चुका है।
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