औरैया। शासन-प्रशासन भरसक प्रयास कर रहा है कि हर किसान को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिले लेकिन, बिचाैलियों का सिंडिकेट उसके मंसूबों पर पानी फेर देता है।
यह लोग किसानों को ऐसे चक्रव्यूह में फंसा लेते हैं जहां से आढ़तियों को कम दाम पर फसल बेचना उनकी मजबूरी बन जाता है। इसके बाद कागजों में खेल करके इसी फसल को सरकारी केंद्रों में एमएसपी पर बेचकर दोगुना मुनाफा कमाया जाता है। जिन कागजों के झंझट से बचने के लिए किसान आढ़त जाते हैं, वही कागज किसी दूसरे के नाम पर तैयार हो जाते हैं और इस प्रक्रिया को सफेद बना दिया जाता है।
जिले में तमाम किसान ऐसे हैं, जो खेती बंटाई पर करते हैं। नियम के अनुसार इनको सरकारी केंद्रों पर बिक्री करने के लिए पंजीकरण कराना होता है, जिसमें भूमि मालिक की सहमति चाहिए होती है। यह सहमति उन्हें मिल नहीं पाती और वे आढ़तियों के पास जाने को मजबूर हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार जिन किसानों ने किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए कर्ज लिया होता है, वे पैसा कटने के डर से मंडी में ही फसल बेचते हैं।
यहीं से कालाबाजारियों का सिंडिकेट अपना काम शुरू कर देता है। पहले ऐसे किसानों की फसल कम दाम पर खरीद ली जाती है। इसके बाद जो भूमि मालिक बटाई पर खेती कराते हैं, उनके कागज लगाकर फसल को सरकारी क्रय केंद्रों पर पहुंचा दिया जाता है। मानक पूरे होने के कारण केंद्र फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद लेते हैं। इसका पैसा भूमि मालिक के बैंक खाते में पहुंचता है, जिसकी बंदरबांट हो जाती है और खेत में मेहनत करने वाला किसान एमएसपी के लाभ से वंचित रह जाता है।
फसल कालाबाजारियों के लिए 6-आर रसीद मददगार साबित होती है। कृषि भूमि पर अनुमानित फसल उत्पादन के हिसाब से एक निश्चित धनराशि की 6-आर रसीद बन जाती है। यानी कि भूमि मालिक उतनी धनराशि की फसल की बिक्री कर सकता है। फर्जीवाड़े से आए रुपयों को इसी रसीद के जरिए ब्लैक से व्हाइट कर लिया जाता है।
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किसानों को इसके लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है। किसान गुमराह न हों। पंजीकरण कराकर सरकारी केंद्रों से एमएसपी पर फसल की बिक्री करें। यदि कोई समस्या आ रही है तो विभाग में संपर्क करें। शासन की मंशा है कि हर किसान की फसल एमएसपी पर ही बिके। 48 घंटे में फसल का भुगतान बैंक खाते में कर दिया जाता है। -बृजेश कुमार, जिला विपणन अधिकारी