हरदोई महोत्सव की बीती शाम शेरो शायरी के नाम रही। आल
इंडिया मुशायरे में नामचीन शायरों की मौजूदगी में जिले के शायरों की गजल
का सुरूर भी लोगों के सर चढ़ के बोला।
तकरीबन दो घंटा देरी से शुरू हुए
मुशायरे की शुरुआत डीएम रमेश मिश्रा ने किया। बरेली से आईं शायस्ता सना ने
मोहब्बत की तासीर बयान करते हुए पढ़ा, ‘यह करिश्मा भी शायद मोहब्बत का है,
इक मुसाफिर मेरा हमसफर हो गया। शिवसरन बंधू सलाह दी, बहुत उम्मीद मत करना
किसी से मेहरबानी की।
बहुत उम्मीद करने से उम्मीदें टूट जाती हैं’। सलमान
जफर ने दर्द बयान किया ‘पूंजी जो घर में थी वो पढ़ाई में लग गई, अफसरों को
नौकरी का लिफाफा कहां से दूं’। हाशिम फिरोजाबादी ने अपनी आवाज का जादू
चलाया। उनके इस शेर, ‘जिनके हाथों से तिरंगा न संभाला जाए ऐसे नेताओं को
संसद से निकाला जाए’ को काफी सराहा गया।
वासिफ फारूकी ने पढ़ा, ‘उसने गुल
कर दिए सब चांद-सितारे मेरे और मैं उसके चरागों का अदब करता रहा’। लखनऊ
के फारूक आदिल की शायरी में उनके कलाम के साथ गजल जैसे उनके लहजे के लिए भी
तालियां बजीं, ‘बहुत शफ्फाफ है पानी यहां का तो क्या दामन निचोड़ा है किसी
ने’।
उमर फारूकी ने गीता कुरान के संदेश को शेर बनाया ‘बुराई मत करो मजहब
की वह मजहब किसी का हो, यही गीता भी कहती है यही कुरान कहता है’। तरन्नुम
नाज फतेहपुरी ने सुरीली गजल सुनाई ‘काम ऐसा जमाने में कर जाऊं मैं नाम
जिंदा रहे और मर जाऊं मैं’।
आजमगढ़ के तश्ना आजमी ने हसीनों की कातिलाना
अदाओं पर तंज कसा ‘यह मत समझना कि तुमसे वह प्यार करते हैं हसीन लोग हैं
अकसर शिकार करते हैं’। महताब हैदर के इस शेर पर जमकर वाहवाही हुई ‘मैं काम
आऊं वतन तेरी अजमतों के लिए यही तमन्ना मुझे बेकरार करती है’।
मोहम्मद
अली साहिल ने पढ़ा ‘किरदार बेच देने का अंजमा यह हुआ दिल में उतरने वाला
नजर से उतर गया’। अजमत शाहाबादी ने हास्य व्यंग्य में अपनी दमदार उपस्थिति
दर्ज करवाई ‘तुम मुझे लाए थे कश्मीर दिखाने अजमत यह तो बंगाल की खाड़ी है
खुदा खैर करे’।
अल्ताफ जिया (मालेगांव) ने शेर सुनया ‘परिंदे बहुत
फड़फड़ाने लगे हैं जो नोचे गए थे वह पर आ गए क्या’। इसके अलावा रामप्रकाश
बेखुद लखनवी व डा. सुमन दुबे आदि ने भी कलाम पेश कर दाद हासिल की।