हरदोई। क्षय रोग (टीबी) के इलाज को पूरा कराने में मरीजों को 18 से 20 माह का इंतजार करना पड़ता है और हैवी डोज वाली मेडिसिन लेनी पड़ती है। मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी कि एमडीआर टीबी से पीड़ित मरीजों का अब छह माह में इलाज हो सकेगा। मेडिकल कॉलेज स्थित जिला क्षय केंद्र पर बीपालएम रेजिमेन तकनीक से मरीजों का इलाज शुरू कर दिया गया है।
मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी संक्रमण का ही एक रूप है। इसमें टीबी बैक्टीरिया सामान्य टीबी दवाओं के प्रभाव से बच सकते हैं। मरीज टीबी का इलाज बीच में छोड़ देता है या फिर दवा का गलत प्रयोग करता है तो स्थिति उत्पन्न होती है। एमडीआर टीबी के लक्षण में लगातार तीन सप्ताह से ज्यादा खांसी, खून के साथ खांसी, तेज बुखार, रात में पसीना, वजन में अचानक कमी, थकान व कमजोरी महसूस होने के साथ ही सीने में दर्द होता है। एमडीआर टीबी के मरीजों को अभी तक लखनऊ मेडिकल कॉलेज स्थित नोडल डीआर टीबी सेंटर भेजा जाता था। वहां से दवा का कोर्स देकर जिला क्षय केंद्र भेजा जाता है।
हालांकि, कुछ समय पहले जिला क्षय केंद्र के पास डीआर टीबी वार्ड संचालित हो गया। एमडीआर मरीज अभी तक 24 महीने दवा खाते थी, इसके बाद 18 माह का रेजिमेन आया, लेकिन अब बीपालएम रेजिमेन से सिर्फ छह माह में संक्रमण मुक्त होकर मरीज स्वस्थ हो सकेगा। बुधवार को रिस्पेट्री मेडिसिन विभागाध्यक्ष शिवम गुप्ता ने डीआर टीबी वार्ड में दवा शुरू कर दी गई। इस मौके पर डाॅ. नोमान उल्ला, डाॅ. प्रदीप कुमार, डाॅ. निखिल, जावेद खान, हरिनाम सिंह, मनोहर लाल माथुर मौजूद रहे।
क्या है बीपालएम रेजिमेन तकनीक
हरदोई। बीपालएम रेजिमेन तकनीक चार दवाओं का कॉम्बिनेशन है। इसमें बेडाक्विलाइन, प्रीटोमैनिड (नई दवा), लाइनजोलिड, मॉक्सीफ्लोक्सासिन जैसी दवा शामिल हैं। यह दवाएं मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के संक्रमण को कम करने में मदद करती है। इस दवा को केवल छह माह खाने की जरूरत होती है। इसके साइड इफेक्ट भी बहुत कम हैं।