माध्यमिक स्कूलों के विद्यार्थी बगैर फर्नीचर व बगैर
गुरुजनों के शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं। इससे स्कूलों में
विद्यार्थियाें की उपस्थिति कम होती जा रही, पर जिम्मेदार इस ओर से अनजान
बने हुए हैं। ज्ञात हो कि जिले में 521 माध्यमिक स्कूल संचालित हैं।
इनमें से 71 अशासकीय सहायता प्राप्त और 41 राजकीय स्कूल हैं। शेष
वित्तविहीन मान्यता प्राप्त विद्यालय संचालित है। इन विद्यालयों में
अधिकांश विद्यालयों में विद्यार्थियों के बैठने के लिए पर्याप्त मात्र में
फर्नीचर तक की व्यवस्था नहीं है। वित्तविहीन में अधिकांश विद्यालय सिर्फ
परीक्षा के दौरान ही नजर आते हैं।
बाकी वर्ष भर उनका कार्य विद्यालय संचालक
के घरों पर ही चलता रहता है। अशासकीय स्कूलों में शहर के कुछ विद्यालयों
को छोड़, अन्य ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में भी फर्नीचर की पर्याप्त
व्यवस्था नहीं है। यहां पर टाटा पट्टी पर बैठकर विद्यार्थियों को शिक्षण
कार्य करना पड़ रहा है। राजकीय स्कूलों में भी स्थित ठीक नहीं है।
इन
विद्यालयों में भी फर्नीचर का टोटा है। ऐसे में विद्यालय के विद्यार्थियों
को शिक्षण कार्य के लिए अपने संसाधन जुटाने पड़ रहे हैं। स्कूलों में
पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण विद्यालयों में विद्यार्थियों की उपस्थित
कम हो रही और कोचिंग सेंटर में उनकी संख्या बढ़ती जा रही है।
इससे शिक्षा
की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है, पर जिम्मेदार इस ओर से अनजान बने हुए हैं।
उधर, राजकीय विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए कुसुमा
फाउंडेशन की ओर से कई विद्यालयों में कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, पर विभाग
को ही नहीं मालूम कि यह कार्यक्रम किन स्कूलों मेें चल रहे हैं और इसका
विद्यार्थियों को क्या लाभ मिल रहा है।
पूरा कार्यक्रम कागजों में ही निपट
रहा है। इससे इसका लाभ विद्यार्थियों को नहीं मिल पा रहा है। उधर,
स्कूलों में विद्यार्थियों को सुविधा प्रदान करने को अभिभावक संघ के नाम पर
विद्यार्थियों से डेढ़ से दो सौ रुपये जमा कराए जाते हैं, पर उनमें कुछ
टीचरों को रखकर बाकी बंदरबांट हो जाता है। इससे स्कूल में विद्यार्थियों के
लिए न तो फर्नीचर की व्यवस्था हो पाती है और न ही टीचर ही मिलते हैं।