प्रांतीय रक्षक दल की देखरेख व उन्हें ड्यूटी आदि
प्रदान करने वाला युवा कल्याण विभाग ही फिर से इन्हीं का भक्षण करने के
आरोपों से घिर गया है। ऐसे ही कुछ आरोप प्रांतीय रक्षक दल संघ ने डीएम को
ज्ञापन देकर एक बार फिर से धरना प्रदर्शन की चेतावनी दी है।
आरोप है कि लाख
कोशिशों के बाद भी ड्यूटी वितरण में रोस्टर नहीं जारी किया जा रहा है, बस
दबाव का फैक्टर ही ड्यूटी लेने में काम आ रहा है। ड्यूटी नियमानुसार न
मिलने से जिले के सक्रिय पीआरडी जवानों की संख्या जहां पूर्व में एक हजार
के आस पास रहा करती थी, वहीं अब 200 के करीब ही सक्रिय मिल पा रहे हैं।
इसके बाद विभाग ने इनमें से 50 को ड्यूटी मुहैया कराने का दावा किया है।
पीआरडी जवानों के आरोप है कि इन ड्यूटी दिलाने में विभाग में सुविधा शुल्क
चल रहा है। यदि पारदर्शिता चलाना चाहे तो विभाग पूर्व से कोड के अनुसार
जवानों का एक रोस्टर विभागीय बोर्ड पर लगाएं, जिससे जवानों को भी मालूम हो
कि अगले माह या उसके बाद उसकी ड्यूटी मंडी समिति में है दुग्ध संघ में या
फिर किसी अन्य विभाग में, पर विभाग में रोस्टर का पोस्टर लगाने से अधिकारी
ड्यूटी में खेल नहीं कर पाएंगे।
पीआरडी संघ के जिलाध्यक्ष राजेंद्र
सिंह यादव ने डीएम को दिए पत्र में कहा कि युवा कल्याण विभाग पीआरडी जवानों
का शोषण व उत्पीड़न व धन उगाही करते चले आ रहे हैं। जिस पर आज तक कोई
कार्रवाई नहीं की गई। जिससे पीआरडी जवान भुखमरी की कगार पर पहुंच गया है।
इससे पीआरडी जवानों में रोष व्याप्त है। जवानों में ट्रेनिंग करके आई
महिलाएं भी शामिल हैं, पर अब तक विभाग ने कहीं भी उनको ड्यूटी नहीं दिलाई।
इसलिए 28 जनवरी को कचहरी प्रांगण में धरना प्रदर्शन करने को बाध्य हैं।
जिलाधिकारी को अपने ज्ञापन के माध्यम से दुखड़ा सुनाने वालों में अमरनाथ,
प्यारेलाल, रामदयाल, हरीश्चंद्र, सुरेश, नरेश चंद्र, रामदास, महाराम सिंह,
राजाराम गौतम और सुषमा आदि मौजूद थे।
उधर, पीआरडी जवानों के शरीर पर
खाकी है और हाथों मेें डंडा। दिल में कुछ करने का जज्बा, पर दुर्भाग्य यह
है कि नहीं है तो इनके पास ड्यूटी। ड्यूटी न मिलने के बाद हार मानकर इस
बेबश खाकी को रिक्शा से लेकर फावड़ा तक चलाना पड़ रहा है।
कभी होमगार्डों
से पहले ही प्रांतीय रक्षक दल का गठन इस उद्देश्य को लेकर किया गया था कि
जिसमें सुरक्षा की दृष्टि से इनको लगाया गया था। यही कारण रहा कि चुनाव आदि
में भी इनको लगाया जाता था, पर पीआरडी के बाद आए होमगार्डों का तो विभाग
अलग कर दिया गया, पर पीआरडी का कुछ नहीं हो सका।
पीआरडी को न तो आज तक
विभाग की तरफ से ही वर्दी व डंडे के अलावा कुछ दिया जा सका और न ही उनको
किसी निजी या सरकारी संस्थाओं के द्वारा नियमित ड्यूटी ही प्रदान की जा पा
रही है। इसका नतीजा यह हुआ कि वह पेट पालने को या तो रिक्शा चलाते नजर
आते हैं या फिर अपने खेतों में या किसी और के खेतों में फावड़ा आदि चलाते
हुए दिखाई देने को विवश है। कारण कि उन्हें परिवार का पालन पोषण व उनका पेट
भरना होता है।
रिक्तियां निकलने के बाद पीआरडी विभाग की ओर से इन आवेदकों
को चयनित करने के बाद उनको 22 दिन का प्रशिक्षण देने के बाद उनको वर्दी व
डंडा प्रदान किया जाता है। जिसके बाद न तो विभाग कुछ और दे पाता है और न ही
जवान को कुछ मिल पाता है। रह जाती है तो बस युवा कल्याण विभाग की तरफ दौड़
व उसकी खाकी के साथ बेरोजगारी।
इस बाबत विभागीय अफसरों का कहना है कि पहले
के समय में जिला योजना में इन पीआरडी जवानों के लिए कुछ बजट का आवंटन होता
था। पर, अब ऐसा कुछ भी नहीं है। जिससे उनको नियमित रूप से ड्यूटी
प्रदान की जा सके। इसके बाद 65 रुपये से लेकर 126 और उसके बाद 185रुपये एक
दिन की ड्यूटी प्रदान करने लगे हैं।
पर जवानों की संख्या अधिक होने एवं
ड्यूटियां कम होने से कुछ ऐसी ही व्यवस्था को संचालित करना उनकी विवशता है।
कई बार लिखा गया, पर आज तक कोई सार्थक परिणाम देखने को नहीं मिल रहे,
जिससे वह भी विवश है और परिस्थितियों का सामना करने को विवश हैं।