सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी के पुष्प काल में
नाग पंचमी 19 अगस्त को नागों के देवता रूप में पूजन कर सुख शांति की कामना
की जाएगी। जिसको लेकर शिव मंदिरों में मंगलवार को भी तैयारियां जारी रहीं।
चाहे
कहानियों में सुना गया हो या फिर फिल्मों में ही क्यों न देखा गया हो, पर
सभी के जेहन में एक बात जरूर है कि नाग की मौत पर नागिन जमकर तांडव करती
है। जहां नाग मारा जाता है, उस स्थल पर पहुंचकर नागिन न सिर्फ नाग की आंखों
में देखकर मारने वालों की तस्वीर अपनी आंखों में उतार लेती है, बल्कि गिन
गिन सभी को मौत के घाट भी उतारती है।
सावन माह में नाग पंचमी आते ही इन
भ्रांतियों व कहावतों को एक बार फिर से बल मिल गया है। शास्त्रों के जानकार
उमाकांत अवस्थी ने बताया कि वैज्ञानिक कारण कुछ भी रहे हों, पर पौराणिक
कारणों में हिंदू धर्म में सावन माह शिव भक्ति का शुभ काल है। इस काल में
शिव व उनके नाम, स्वरूप व शक्तियों का अलग अलग रूपों, तरीकों से स्मरण किया
जाता है।
भगवान शिव को कालों का काल कहा जाता है। भगवान शिव के गले में
नाग का हार पहनना और कंठ में विष उतारकर नीलकंठ बनना इसका प्रमाण है कि
सर्प काल का ही रूप माना जाता है। यही कारण है कि सावन माह के शुक्ल पक्ष
की पंचमी के पुष्प काल में नाग पंचमी 19 अगस्त पर नागों के देवता रूप में
पूजा कर सुख शांति की कामना की जाएगी।
विधि विधान से भगवान शिव के साथ नाग
देवता का पूजन अर्चन शुभ लाभ देता है। यहां तक कि नागों को दूध पिलाने की
भी पौराणिक परंपराएं हैं। उधर, नाग पंचमी नाग जाति के जन्म का भी समय माना
जाता है। नाग पंचमी आते ही आम जन मानस में सांपों से जुड़ी लोक मान्यता एक
बार फिर मुखर हो चली हैं कि सांप अपने साथी की मौत का बदला लेते हैं।
यह
भी कहा जाता कि नागिन रास्ता दूर से ही देख लेती है और नाग के पास पहुंच
जाती है, पर इसके पीछे उनकी सर्प प्रजाति की बनावट, उनकी अपनी विशेषताएं
होती है। इस संबंध में मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डाक्टर एके यादव ने
बताया कि असल में सांपों की घ्राण शक्ति यानी सूंघने की शक्ति काफी तेज
होती है।
प्राकृतिक रूप से सांप अपने शरीर से एक गंध पदार्थ छोड़ते हैं,
जिसे फेरामोन नाम से भी जाना जाता है। तेज क्षमता और गंध के प्रति
संवेदनशील होने के कारण दूर से आ रही इस गंध को सूंघकर वह सांप आ जाता है।