पिहानी। कृष्ण भक्ति काव्यधारा के सशक्त हस्ताक्षर और हिंदी साहित्य में बृजभाषा के प्रसिद्ध कवि रसखान की पिहानी ने आज भी यादें संजो रखी हैं। उनकी रचनाओं से कृष्ण भक्ति की जो मिसाल पेश की, वो अन्यत्र नहीं मिलती।
जन्मस्थान, जन्मतिथि व नाम पर एक नजर -
इतिहास और पाठ्यक्रम की किताबों में रसखान का पूरा नाम सैयद इब्राहिम पिहानी वाले दर्ज है। रसखान का नाम कहीं-कहीं रसखान और रसखां भी मिलता है। उनके जन्म स्थान और जन्मतिथि को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है, लेकिन ज्यादातर इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि रसखान का जन्मस्थान हरदोई जिले का पिहानी नगर ही है। रसखान पिहानी से दिल्ली चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए। रसखान ने स्वयं लिखा है कि गदर के दौरान जब दिल्ली शमशान बन गई, तो वह दिल्ली से ब्रज (मथुरा) चले गए और वहीं रहने लगें। रसखान की समाधि मथुरा के महाबन जिले में है। पुस्तक ''''''''रसखानि'''''''' में भी इसका उल्लेख है कि वह पिहानी में जन्मे थे।
जन्माष्टमी पर याद किए जाते रसखान-
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर रसखान को भी याद किया जाता है। कहा जाता है कि पिहानी में रसखान का जन्म एक जागीरदार घराने में हुआ था। दुर्भाग्य से कस्बा में रसखान का एक भी स्मारक नहीं है। हालांकि, रसखान के शिष्य कहे जाने वाले सैयद सुलेमान शाह की मजार मोहल्ला मीरसराय में है। स्थानीय निवासियों ने अपनी श्रद्धा से इस स्थान पर एक चबूतरा बनवाया। अब लोगों ने मुख्य मार्ग पर बोर्ड और चहारदीवारी बनवाने की मांग की है। लगभग छह सात वर्ष पूर्व तत्कालीन डीएम एके सिंह राठौर के प्रयास से हरदोई में प्रेक्षाग्रह का निर्माण हुआ था। साहित्य प्रेमियों की मांग पर इसको रसखान का नाम दिया गया।
साहित्य की धरोहर थे रसखान- सैयद इब्राहीम रसखान की कृष्णजी के प्रति अगाध श्रद्धा थी। कृष्ण भक्ति ने उन्हें ऐसा मुग्ध किया कि गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा लेकर ब्रजभूमि में जा बसे। रसखान की रचनाओं में न केवल श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्ति है बल्कि कृष्ण भूमि के प्रति अनन्य अनुराग भी हैं। उनके काव्य में राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का मनोहर वर्णन मिलता है। उन्होंने ब्रजभाषा का अत्यंत सरस और मनोरम प्रयोग किया। श्रीमद्भागवत का फारसी और हिंदी में अनुवाद किया। सुजान रसखान और प्रेम वाटिका जैसी कई उपलब्ध कृतियों के रचनाकार रसखान के सवैये, दोहे और छंद आदि आज भी प्रासंगिक है।