हरदोई। मेडिकल कॉलेज में दवाओं की किल्लत कम होने का नाम नहीं ले रही। दर्द और चोट की दवाओं का टोटा तो बना ही है, साथ ही मरीजों को अब मानसिक रोग की दवा भी फार्मेसी में नहीं मिल रही। इससे मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। फार्मेसी में मानसिक रोगों की दवा न होने से तीमारदार निजी मेडिकल स्टोर से ऊंचे दामों पर खरीदने को मजबूर हैं। खास बात यह है कि वेयर हाउस में दवाएं उपलब्ध होने के बाद भी डिमांड नहीं की जा रही।
मेडिकल कॉलेज में मरीजों को परामर्श भले ही मिल रहा लेकिन दवाओं के लिए भटकना पड़ रहा है। डाईक्लोफेनिक जेल ट्यूब, चोट का बीटाडीन और खांसी में प्रयोग किए जाने वाले कफ सिरप की डिमांड होने के बाद भी मेडिकल कॉलेज की फार्मेसी पर उपलब्धता नहीं हाे रहे हैं। इतना ही नहीं फार्मेसी में मानसिक रोग से संबंधित एक भी दवा नहीं है। इससे मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। चिकित्सीय परामर्श के बाद मरीज जब दवा काउंटर पर पहुंचते हैं तो लंबी लाइन में लगने के बाद उन्हें बैरंग लौटना पड़ता है। निजी स्टोर पर दवाओं के नाम पर मरीजों से कई गुना अधिक कीमत वसूली जा रही है। दूर-दराज से आए तीमारदारों के लिए यह महंगी दवाएं खरीदना उनके बस से बाहर हो रहा जिससे कई मरीजों का इलाज बीच में ही छूटने की नौबत आ गई है।
केस-1- पड़ोसी जिला सीतापुर के पिसांवा ब्लॉक के राजूपुरा गांव के रहने आशाराम मानसिक रोग से पीड़ित हैं। सिर में दर्द समेत उन्हें भ्रम होने की दिक्कत है। मेडिकल कॉलेज में बेहतर उपचार का नाम सुनकर उन्होंने यहां से उपचार शुरू कराया लेकिन दवाएं उन्हें मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ रही हैं। उनका कहना है कि कई दवाएं काफी महंगी हैं लेकिन उपचार कराना है तो दवाएं लेनी पड़ती है। सभी दवाएं निशुल्क नहीं मिल पा रही हैं।
केस-2- शहर के लखनऊ रोड निवासी आरती श्रीवास्तव का उपचार चल रहा है। चिकित्सक ने उन्हें रेक्सीपारा, क्लोनाजिपॉम, टू-पीनॉल सहित अन्य दवाएं लिखीं। इनमें से एक भी दवा फार्मेसी में नहीं मिली। उन्हें मजबूरी में तीन दिन की दवा 450 रुपये में मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ी।
...मेडिकल कॉलेज नहीं आ रहीं दवाएं
विभागीय जानकारों का कहना है कि यह संकट दवाओं की कमी की वजह से नहीं बल्कि डिमांड मैनेजमेंट में लापरवाही के कारण है। वेयर हाउस में दवाएं मौजूद हैं लेकिन समय पर इंडेंट न भेजे जाने और ट्रांसपोर्टेशन की सुस्ती के कारण फार्मेसी के रैक खाली पड़ी हैं। बता दें कि वेयर हाउस में ओमेपरॉजोल, इक्सीटॉलोपॉरम, डोमपेरिडोन दवाएं उपलब्ध हैं। जो अलग-अलग मामलों में मानसिक रोगियों को दी जाती हैं लेकिन मेडिकल कॉलेज में यह दवाएं नहीं हैं।
मेडिकल कॉलेज में दवाओं की उपलब्धता लगातार बताई जा रही है। डिमांड करते ही दो से तीन दिन में दवा आ जाती है। अगर, वेयर हाउस में दवाओं का स्टॉक है तो उसे तत्काल मंगवाकर मरीजों को वितरित कराया जाएगा। लापरवाही बरतने वाले कर्मियों पर कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. जेबी गोगोई, प्राधानाचार्य, मेडिकल कॉलेज