जिला जेल में 10 बच्चे अपनी सजायाफ्ता अथवा विचाराधीन
बंदी मां के साथ जेल में अकारण सजा भुगत रहे हैं। जेल में बंद 48 महिला
बंदियों में 11 सजायाफ्ता, 37 विचाराधीन बंदी है। बिना जुर्म के सजा काट
रहे उनके ‘बच्चे कन्हैया बन पाएंगे’ यह कहना मुश्किल है, क्योंकि सुप्रीम
कोर्ट के आदेश के बावजूद जेल में बच्चों की देखभाल के पर्याप्त इंतजामों की
व्यवस्था नहीं हो पा रही है।
सुप्रीमकोर्ट ने वर्ष 06 में जेलों में
सुधार के लिए प्रशासन को आदेश दिए थे। इसके बावजूद जिला कारागार में छोटे
बच्चों के लिए न तो क्रेच की व्यवस्था है और न ही सामान्य विकास के और कोई
साधन हैं। बच्चे अपनी मां के साथ बंदी का जीवन जीने को मजबूर हैं। इन
महिलाओं के बच्चों को अन्य बंदियों की तरह ही भोजन मिलता है, जिसे वह खाते
हैं।
हैरत की बात तो यह है कि कोई भी समाजसेवी संगठन इन बच्चों को नई दिशा
देने के लिए आगे नहीं आया। जिला कारागार में बंद महिलाओं में सुहाना की तीन
वर्षीय पुत्री आकृति, रामरती का डेढ़ वर्षीय बालक अखिलेश, रामबेटी की चार
वर्षीय बेटी रचना व ढाई वर्षीय कान्हा, डिंपल का तीन वर्षीय पुत्र सुधांशु,
दो वर्षीय पुत्री सुधा, नीलम की चार वर्षीय पुत्री अंशिका।
राधिका की
तीन वर्षीय पुत्री मंजू, मुनारा का तीन वर्षीय पुत्र शहनाज और संगीता की
सात माह की बेटी बिट्टो बंद है। इस बाबत जेल अधीक्षक विजय प्रकाश ने बताया
कि सुप्रीमकोर्ट के आदेशानुसार महिला बंदियों के साथ रह रहे छह वर्ष तक के
बच्चों की देखभाल की जा रही है। बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचर, खेलकूद के
लिए खिलौने व झूले की व्यवस्था की गई है। जेल मेें महिलाओं की अलग बैरक है
जिसमेें बच्चे उनके साथ रहते हैं।