जिले में कामधेेनु योजना विधिवत शुरू होने से पहले ही
हाशिए पर नजर आने लगी हैं। एक साल गुजरने के बाद भी जहां तीन बड़ी और 12
मिनी डेयरियां ही सक्रिय हो पाई हैं, वहीं दुग्ध उत्पादन के बाद बिक्री की
कोई सुगठित योजना न होने से कामधेनु का दूध पानी के भाव बिक रहा, जिससे
डेयरी संचालकों के माथे पर जहां चिंता की लकीरें दिखने लगी हैं, वहीं
बिचौलियों की पौ बारह है।
ज्ञात हो कि जिले में कामधेेनु योजना को शुरू
हुए एक साल से ज्यादा समय गुजर गया। माधौगंज में विवेक सिंह, नानकगंज ग्रंट
में निखत बेगम, भरखनी में रामप्रकाश अग्निहोत्री द्वारा योजना की बड़ी
डेयरी लगाकर जहां दुग्ध उत्पादन कर रहे, वहीं मिनी डेयरियों में 12 सक्रिय
हो चुकी हैं।
सबसे ज्यादा समस्या डेयरी मालिकानों को उत्पादन के बाद बिक्री
की आ रही है। उनका कहना है कि दुग्ध उत्पादन तो जैसे तैसे हो रहा, पर
बिक्री सही न हो पाने से मेहनत में पानी फिर रहा है। उधर, कामधेनु डेयरी की
सफलता को सबसे बड़ी जरूरत है डेयरी पर ही पैकेजिंग प्लांट लगाने की है।
स्वयं पशुपालन विभाग का भी मानना है कि जब तक इस ओर डेयरी मालिक नहीं
सोचेंगे और प्लांट नहीं लगाएंगे, तब तक शायद उन्हें अच्छा पैसा उनकी डेयरी
के उत्पादन का न मिल सके। पशुपालन विभाग का मानना है कि अगर डेयरी पर ही
दुग्ध उत्पादन के साथ ही उसका पाच्यूराइजेशन कराने के बाद उसकी पैकेजिंग
कर दी जाए तो बिचौलिए उनके दुग्ध उत्पादन का लाभ नहीं उठा पाएंगे और बाजार
में स्वयं उचित दामों पर इस दूध की बिक्री कर सकेंगे।
उधर, प्रदेश में
कामधेनु योजना के लागू हुए कम से कम एक साल से ज्यादा का समय हो गया है, तब
से लेकर अब तक तीन कामधेनु डेयरी जिले में क्रियाशील हो पाई हैं, जबकि 17
मिनी कामधेनु डेयरी के लिए लोन की मंजूरी बैंकों के माध्यम से दिला दी गई
है।
इसमें से 12 मिनी कामधेेनु ही अब तक सक्रिय होकर दुग्ध उत्पादन कर पाई
हैं। पशुपालन विभाग की माने तो अब तक कई लोग डेयरी की मंजूरी कराने के बाद
भी डेयरी को न चला पाने की स्थिति में उसे सरेंडर कर चुके हैं।