सेमौर गांव मेें अग्निकांड के बाद पीड़ितों के दिन और
रात खुले आसमान के नीचे कट रहे हैं। सड़क पर आए परिवारों के लिए हमदर्दी
केवल शब्दों के जरिए ही की गई। चौबीस घंटे गुजरने के बाद दोपहर दो बजे तक
किसी अफसर या नेता ने अग्निपीड़त परिवारों के लिए राशन-पानी का इंतजाम करना
जरूरी नहीं समझा।
बड़े-बड़े दावे करने वाले सामाजिक संगठनों को भी इसका
ध्यान नहीं रहा। ज्ञात हो कि शुक्रवार की दोपहर सेमौर गांव में घूरे की
चिंगारी ने आठ घरों को पूरी तरह से तबाह कर दिया था। लोगों के घरों का सारा
सामान, नगदी और अनाज भी जल गए। अग्निपीड़ित परिवारों ने रात खुले आसमान की
नीचे गुजारी।
आग बुझाने के दौरान और इसके बाद गांव में कई अफसर आए, पर
किसी ने अग्निपीड़ितों के खाने-पीने का इंतजाम नहीं किया। गांव के पड़ोसी
लोगों ने पहुंच कर इन पीड़ितों का दुख अवश्य बांटा। सुबह भी यूं गुजर गई।
अग्निपीड़ित सुबह होते ही घरों में राख हो चुके सामान में काम की बचीं
वस्तुएं ढूंढते रहे।
जून की तपती दोपहरी मेें अग्निपीड़त परिवारों ने खुले
आसमान के नीचे पेड़ का सहारा लिया। मिश्री लाल को अपने सारे सामान के
साथ बेजुबान जानवरों के जलने का दर्द है। रामसेवक, चरन सिंह, वीरेंद्र पाल,
रामकुमार, महेंद्र, रितवरन व रामभजन के पास भी पहने गए कपड़ों के सिवाय
कुछ भी नहीं बचा।
महेंद्र की बाइक और साइकिल रिपेयरिंग की दुकान में रखा
सारा सामान जल गया। लोहे के कीमती पुर्जे और सामान भी पिघल कर बेकार हो गए
हैं। गांव में दूसरे दिन भी आग के कहर का खौफ लोगों के चेहरों पर साफ झलक
रहा था। जमीन पर आ गए परिवारों ने शीघ्र सरकारी इमदाद की गुहार लगाई है।