पाली (हरदोई)। लॉकडाउन के कारण पहले से ही परेशान सब्जी उगाने वाले किसानों के लिए पिछले कुछ दिन में कई बार बढ़े गर्रा नदी के पानी ने मुसीबत खड़ी कर दी है। काफी मात्रा में सब्जियां पानी में डूब गईं। जो बचीं हैं उन्हें औने-पौने दामों में बेचना मजबूरी है। कई बार तो खरीदार न मिलने पर उपज मवेशियों के लिए डालनी पड़ती है।
लॉकडाउन में बाहर की मंडियों से न तो व्यापारी आ रहे हैं और न किसान उपज भेज पा रहे हैं। गर्रा नदी की कछार में पाली के आसपास तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी, करेला आदि सब्जियां होती हैं।
किसानों के मुताबिक कछार में कद्दू और लौकी की अच्छी उपज हुई है। लेकिन पीलीभीत के पास बांध से पानी छोड़ने के कारण पिछले कुछ समय में पांच बार गर्रा नदी में पानी बढ़ा और तलहटी में बोई गई तरोई, खीरा, करेला जैसी सब्जियों की पौध नदी में समा गई। किसान बची फसल बड़ी मंडी तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं।
किसान कहते हैं कि मंडी के उत्पादों को लाने ले जाने पर भले ही छूट हो, लेकिन लॉकडाउन का पालन करने के लिए बड़े आढ़तियों और व्यापारियों ने इस बार संपर्क ही नहीं किया। कस्बे में लगने वाले सब्जी बाजार में उपज ले जाने पर औने-पौने दाम मिलते हैं। अमूमन 10 से 15 रुपये किलो बिकने वाली तरोई के दाम भी गिरकर पांच से छह रुपये तक आ गए हैं।
किसानों ने बताई समस्या
पटियानीम निवासी राकेश कश्यप ने बताया कि कछार में एक हेक्टेयर भूमि 60 हजार रुपये ठेके पर ली थी। 60 हजार की लागत फसल तैयार करने में आई। परिवार सहित फल और सब्जियों को तोड़कर मंडी ले जाते हैं, लेकिन वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा।
छंगा कश्यप का कहना है कि 25 हजार रुपये में एक एकड़ जमीन ठेके पर ली थी। अक्टूबर से अप्रैल तक पूरा परिवार फसल के लिए लगा रहा। अब लागत भी नहीं निकल पा रही है। मजबूरी में अब सब्जियों को कछार में ही छोड़ना शुरू कर दिया है।
लंकुश कश्यप ने बताया कि उन्होंने एक हेक्टेयर भूमि 70 हजार रुपये में ठेके पर ली थी। फसल तैयार करने में लगभग इतनी ही लागत आ गई। कद्दू, लौकी का कोई भाव नहीं मिल रहा। इस साल परिवार चलाना मुश्किल होगा और कोई दूसरा धंधा भी ढूंढना पड़ेगा।