लखनऊ में राष्ट्रपति से सम्मानित होने के बाद मंजेश कुमार ।
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खेती को अपना ओढना बिछौना मानने वाले कुंवरपुर के किसान राकेश कुमार के बेटे मंजेश ने हरदोई का नाम पूरे प्रदेश में रोशन किया है। उनकी इस कामयाबी पर परिवार ही नहीं पूरा गांव इतरा रहा है। मंजेश को शुक्रवार को लखनऊ में राष्ट्रपति रामनाथ कोविद ने दो स्वर्ण पदक प्रदान किए। उन्होंने डाक्टर भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट आफ एप्लाइड मैथमेटिक्स की सामान्य और आरक्षित श्रेणी में गोल्ड मेडल हासिल किया है।
भरखनी विकास खंड के ग्राम कुंवरपुर में बामुश्किल 14 बीघा भूमि के मालिक राकेश कुमार के दो पुत्र और एक पुत्री हैं। बड़ा बेटा दीप कुमार जूनियर रिसर्च फेलो है, तो शुक्रवार को उनके छोटे बेटे मंजेश कुमार ने राष्ट्रपति के हाथ दो स्वर्ण पदक हासिल किया। उनकी इस उपलब्धि से किसान राकेश का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। मंजेश पढ़ाई लिखाई में शुरू से ही होशियार रहे हैं। गांव प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई के बाद वह जवाहर नवोदय विद्यालय पिहानी से वर्ष 2010 में हाईस्कूल में 74 फीसदी और 2012 में इंटरमीडिएट में 70.2 फीसदी अंक हासिल किया। शाहजहांपुर के जीएफ कालेज से वर्ष 2015 में 64 फीसदी अंक के साथ बीएससी की पढ़ाई पूरी की। फिर उन्हें डाक्टर बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय में दाखिल मिल गया। यहां डिपार्टमेंट आफ अप्लाइड मैथमेटिक्स में उन्हें 89.38 फीसदी अंक मिले। राष्ट्रपति रामनाथ कोविद ने उन्हें लखनऊ में शुक्रवार को दो गोल्ड मेडल पहनाकर सम्मानित किया।
राकेश कुमार ने अपने बच्चों को पढ़ाने लिखाने के लिए हाड़तोड़ मेहनत की। खेतों में रात दिन हल चलाया तो बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्जा भी लिया। राकेश बताते हैं कि क्रेडिट कार्ड और भूमि विकास बैंक का दो लाख रुपया उनके ऊपर कर्जा है। बेटे की इस उपलब्धि पर वह उनकी पत्नी मुन्नी देवी के साथ ही पुत्री अर्चना देवी भी बेहद खुश हैं, लेकिन लखनऊ न जा पाने का मलाल है। राकेश बताते हैं कि आर्थिक तंगी के चलते वह लखनऊ नहीं जा पाए। हालांकि वह कहते हैं कि रुपये तो उधार ले लेते, लेकिन कार्यक्रम में जाने के लिए पास भी उनके पास नहीं था।
राष्ट्रपति से सम्मानित मंजेश कुमार ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि वह अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, भाई बहन और सभी गुरुजनों को देते हैं। उन्होंने कहा कि अपनी पूरे शैक्षिक जीवन में उन्होंने कभी भी ट्यूशन नहीं पढ़ी। वह कहते हैं कि मनोयोग से पढ़ाई की जाए तो ट्यूशन की कोई जरूरत ही नहीं है। वह कहते हैं कि प्रोफेसर बनकर प्रतिभाओं को निखारकर देश सेवा करना ही उनका ध्येय है।