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दिव्यानंद स्प्रिचुअल फाउंडेशन की हत्या के मामले में छह हिरासत में

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अमर उजाला ब्यूरो
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संडीला।
दिव्यानंद स्प्रिचुअल फाउंडेशन की प्रबंध निदेशक की हत्या के मामले में पुलिस ने छह लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। घटना को लेकर अभी तक कोई तहरीर न मिलना पुलिस के लिए परेशानी का सबब बना है।
दिव्यानंद स्प्रिचुअल फाउंडेशन की प्रबंध निदेशक दयारानी लगभग चार दशक से संत कृपाल नगर में रह रहीं थीं। संत कृपाल नगर के संस्थापक स्वामी दिव्यानंद की शिष्या के रूप में उनकी पहचान थी। 2014 में स्वामी दिव्यानंद की मृत्यु के बाद दयारानी (65) दिव्यानंद स्प्रिचुअल फाउंडेशन की मैनेजिंग डायरेक्टर बनाई गई थीं। उनका शव रविवार की सुबह आश्रम के मुख्य भवन (कृपाल भवन) में उनके कमरे में पड़ा मिला था। आश्रम में रहने वाले अनुयायियों ने इसकी जानकारी उनके भाई लखनऊ के थाना कृष्णा नगर के विकास नगर निवासी भीषम अग्रवाल को दी थी। वह मौके पर पहुंचे थे और शव लेकर चले गए थे। बाद में पुलिस ने शव वापस मंगवाया था। डीएम की अनुमति से रात में शव का पोस्टमार्टम कराया गया था। पोस्टमार्टम में गला दबाकर और सिर पर भारी वस्तु से प्रहार कर हत्या की पुष्टि हुई थी। पुलिस ने आश्रम में रहने वाले छह लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। संडीला के प्रभारी निरीक्षक शैलेंद्र सिंह ने बताया कि अभी तक किसी ने इस प्रकरण में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए तहरीर नहीं दी है। फिर भी पुलिस अपने स्तर से जांच कर रही है।
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इंसेट
16 सितंबर को एकत्र होंगे निदेशक, होगा फैसला
घटना की जानकारी पाकर दिव्यानंद स्प्रिचुअल फाउंडेशन की निदेशक जयपुर निवासी डॉ. सुधा गर्ग आश्रम पहुंचीं। उन्होंने बताया कि वह 2012 से फाउंडेशन की निदेशक हैं। बताया कि 16 सितंबर को सभी निदेशक आश्रम में एकत्र होंगे और उसके बाद आगे की रूपरेखा तय की जाएगी। उन्होंने बताया कि स्वामी दिव्यानंद ने अपने जीवनकाल में ही इच्छा पत्र (वसीयत) लिख दिया था। इसे 2017 में खोले जाने की बात चर्चा में थी। उम्मीद थी कि इससे उनका उत्तराधिकारी सामने आ जाएगा। इच्छा पत्र अब किसके पास है यह कोई नहीं जानता। ऐसे में उत्तराधिकारी का चयन स्वामी दिव्यानंद की मंशा के अनुसार हो पाना भी कठिन ही है।
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एमडी बनने के बाद से ही था खतरा
डॉ. सुधा गर्ग ने बताया कि जब से दयारानी को प्रबंध निदेशक बनाया गया था तभी से उनको खतरा था। हत्या की आशंका खुद दयारानी को भी थी। उन्होंने कहा कि अगर आश्रम में सीसीटीवी लगा होता तो हत्यारों के बारे में अहम जानकारियां मिल सकती थीं।
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आखिर परिजन क्यों भागे थे शव लेकर
दयारानी की संदिग्ध हालात में मौत होने का समाचार जब उनके परिजनों को मिला तो भाई भीषम अग्रवाल मौके पर पहुंच गए थे। इसके बाद वह दयारानी के शव को संत कृपाल नगर की एंबुलेंस में रखकर लखनऊ चले गए थे। पुलिस से लेकर संडीला के बाशिंदों तक के जेहन में यही सवाल घूम रहा है कि परिजन शव लेकर क्यों भागे थे।
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आखिर कमरे के अंदर कैसे पहुंचे हत्यारे
पूरी घटना को लेकर एक बड़ा सवाल ये है कि हत्यारे आखिर दयारानी के कमरे तक कैसे पहुंचे। दयारानी आश्रम परिसर में बने कृपाल भवन के दूसरे तल के उसी कमरे में रहती थीं जिसमें अपने जीवनकाल के दौरान स्वामी दिव्यानंद रहा करते थे। इस कमरे तक पहुंचना आसान नहीं है। हमेशा यहां पर सुरक्षाकर्मी मौजूद रहते हैं। कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था। घटना स्थल तक पहुंचने के लिए भी सुरक्षाकर्मियों को पीछे से जाकर जाली और ग्रिल काटनी पड़ी थी।

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विवाद और आश्रम का आपस में पुराना नाता
संत कृपाल नगर में संचालित आश्रम और विवाद एक दूसरे के पर्याय रहे हैं। जानकार बताते हैं कि1980 में संत कृपाल आश्रम की स्थापना हुई थी। स्वामी दिव्यानंद ने एक बीघा भूमि ग्राम सभा मीतों में खरीदी थी और उस पर आश्रम बनवाया था। बाद में उन्होंने पौधरोपण के नाम पर ग्राम सभा की भूमि पर अवैध कब्जा कर लिया था। 90 के दशक में आईएएस अफसर एमवीएस रामी रेड्डी की तैनाती संडीला में एसडीएम के तौर पर हुई थी। उन्हें जब भूमि कब्जा किए जाने का पता चला तो यह भूमि उन्होंने वन विभाग के खाते में दर्ज करा दी थी। इसके बाद दिव्यानंद हाईकोर्ट चले गए थे और स्टे आर्डर ले आए थे। आज की तारीख में भी आश्रम की अधिकतर भूमि वन विभाग के खाते में दर्ज है।
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समाधि से रोकने आए थे मुख्यमंत्री
जनपद के दिग्गज नेता रहे गंगा भक्त सिंह का आश्रम में आना-जाना था। वर्ष 2000 में स्वामी दिव्यानंद ने शरीर त्यागने और समाधि लेने का एलान किया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब केंद्र सरकार में गृहमंत्री राजनाथ सिंह उन्हें समाधि लेने से रोकने आए थे। इस मौके पर बड़ी संख्या में उनके अनुयायी जुटे थे। मुख्यमंत्री के कहने पर उन्होंने अपना निर्णय बदल दिया था और समाधि नहीं ली थी। उसी रात उन्होंने देवेंद्र मोहन को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। इसके बाद से ही संत कृपाल नगर की संपत्ति को लेकर विवाद शुरू हो गया था।
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देवेंद्र मोहन की शख्सियत भी सवालों में
हर कोई जानना चाहता है कि आखिर देवेंद्र मोहन कौन थे। इसको लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं हैं। आम चर्चा यह है कि देवेंद्र मोहन स्वामी दिव्यानंद की कथित संतान थे। जब देवेंद्र मोहन को इसका पता चला तो वह अज्ञातवाश में चले गए। तब से देवेंद्र मोहन अब तक संत कृपाल नगर नहीं आए। 2014 में जब स्वामी दिव्यानंद का निधन हुआ तो उनके अंतिम संस्कार में भी देवेंद्र मोहन शामिल नहीं हुए। जबकि उनके इंतजार में स्वामी दिव्यानंद का शव कई दिन तक आश्रम में ही रखा रहा था।

- दिव्यानंद फाउंडेशन की एमडी की हत्या में छह हिरासत में
- गला दबाकर सिर पर भारी वस्तु से वार कर की गई थी हत्या
- कमरे में रविवार सुबह पड़ा मिला था शव
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