संवाद न्यूज एजेंसी
हरदोई। इसे चकबंदी विभाग की प्रक्रिया या व्यवस्था कहे या फिर मनमानी, बहरहाल कुछ भी हो हरियावां के हिल्लापुर के किसान 15 साल से चकबंदी प्रक्रिया को लेकर परेशान हैं। चकबंदी कराए जाने के छह सितंबर 2008 को जारी हुए गजट के बाद विभाग के अधिकारी अभी तक प्रक्रिया ही पूरी नहीं करा पाए हैं। चकबंदी कब तक हो पाएगी इसे लेकर संशय बना हुआ है।
वैसे भी एक कहावत है कि जिस गांव में चकबंदी हो जाए, वहां पर लुटेरे और डकैत भी जाने से बचते हैं। विभाग की ओर से चकबंदी कराए जाने के लिए छह सितंबर 2008 को गजट कराए जाने के बाद 18 मार्च 2010 को चकबंदी की पहली प्रक्रिया के तहत प्रारूप जारी किए गए। तब से 15 साल पूरे होने के बाद भी चकबंदी पूरी नहीं हो पाई है। आलम यह है कि गांव में अभी तक अधिकारियों की खुली बैठक तक नहीं हो पाई है। राजस्व विभाग की ओर से चकबंदी विभाग को दिए गए अभिलेखों में हिल्लापुर में 379 भूमि के गाटा है।
बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी अधिकारी का प्रभार देख रहे उन्नाव के एसओसी सुरेश सागर ने बताया कि विभाग से जो अब तक जानकारी मिली है उसमें हिल्लापुर में गांव की दलबंदी के कारण चकबंदी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकी है। संभावना है कि ग्रामीणों के विरोध के चलते गांव को चकबंदी से अलग भी किया जा सकता है।
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हिल्लापुर ही नहीं 10 गांवों में अटकी है चकबंदी
विभाग की ओर से चकबंदी के लिए छह सितंबर 2008 को कराए गए गजट में हिल्लापुर के साथ ही ऐसे ही अन्य गांव भी सूची में शामिल हैं। इन गांवों पर गौर करें तो बखरिया में 558, शाहपुर बिनौरा में 1,130, धोबिया में 870, मझिया में 2,081, अगौलापुर में 823, पुरवा देवरिया में 384, कटिघरा में 111,34, कठेठिया में 503 व टंडौरखेड़ा में 755 गाटों से जुड़े किसान प्रभावित हैं।
काम के लिए दो-दो विभागों के लगानी पड़ती दौड़
चकबंदी का गजट होते ही गांवों के भू-अभिलेख राजस्व विभाग के पास से चकबंदी विभाग को हस्तांतरित करा दिए जाते हैं। ऐसे में चकबंदी वाले गांवों के किसानों को इंतखाब से लेकर उत्तराधिकार व वरासत तक के लिए चकबंदी और राजस्व विभाग की दौड़ लगानी पड़ती है। इससे किसानों को समय खराब होने के साथ ही आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।