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Hardoi News: 64 करोड़ रुपये के सामुदायिक शौचालयों की देखरेख पर हर माह 77.58 लाख खर्च, फिर भी कबाड़

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हरदोई। स्वच्छता अभियान ग्रामीण के तहत ग्राम पंचायतों में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण कराया गया था। मंशा यह थी कि खुले में कोई भी शौच न जाए। जनपद की 1293 ग्राम पंचायतों में सामुदायिक शौचालयों के निर्माण पर तकरीबन 64 करोड़ रुपये खर्च हुए। बावजूद इसके इन शौचालयों का कोई उपयोग नहीं है। हद तो यह कि इन शौचालयों की देखरेख के लिए हर ग्राम पंचायत में केयर टेकर भी तैनात हैं। केयर टेकरों के मानदेय पर हर माह 77.58 लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। अहम सवाल यह है कि न तो शौचालयों के ताले खुलते हैं न ही केयर टेकर इनकी देखरेख करते हैं तो मानदेय आखिर किस बात का जारी हो रहा है। इस सबसे इतर ज्यादातर सामुदायिक शौचालयों की पानी की टंकी टूटी हैं और इनमें इस्तेमाल के लिए पानी भी नहीं है।
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उदाहरण-1
भरावन विकास खंड के छतिहा रामपुर गांव में सामुदायिक शौचालय बना है। पिछले लगभग तीन साल से इस शौचालय का ताला तक नहीं खुला। यहां केयर टेकर के पद पर गांव की सुमन तैनात हैं। ताला भले ही न खुल रहा हो लेकिन सुमन को केयरटेकर के तौर पर छह हजार रुपये प्रति माह का भुगतान मिल रहा है।


उदाहरण-2
भरावन विकास खंड के गोनी गांव में सामुदायिक शौचालय बना है। इस शौचालय में हर वक्त ताला पड़ा रहता है। यहां की केयर टेकर गांव की रामवती हैं। उन्होंने ने बताया कि सामुदायिक शौचालय की पानी की टंकी टूटी है। अंदर भी टोटियां टूटी हैं और साफ-सफाई का कोई सामान नहीं है। उन्हें भी मानदेय लगातार दिया जा रहा है।
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उदाहरण-3
सांडी विकास खंड की ग्राम पंचायत ढिगासर में भी सामुदायिक शौचालय बना है। यहां सामुदायिक शौचालय की दुर्दशा हो चुकी है। देखरेख के अभाव में यहां गंदगी फैली है। वॉश बेसिन टूटकर जमीन पर गिर चुका है। अंदर परिसर भी गंदा है। यहां भी केयरटेकर की तैनाती है और केयर टेकर को हर माह मानदेय भी दिया जा रहा है।


उदाहरण-4
बहेरिया में भी सामुदायिक शौचालय बना है। इस शौचालय में भी ताला पड़ा रहता है। बाहर से सही सलामत दिखने वाला यह सामुदायिक शौचालय अंदर से पूरी तरह खराब है। यहां पानी की टंकी टूटी है और पानी भरने से लेकर टोटी तक का इंतजाम नहीं है। यहां केयर टेकर कभी कभार आती हैं लेकिन मानदेय पूरा मिल रहा है।





सफाई होती नहीं, सामग्री के नाम पर खपाए जा रहे 77 लाख रुपये
जनपद में 1293 ग्राम पंचायतों में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण हो चुका है। प्रत्येक शौचालय की सफाई सामग्री खरीदने के लिए हर छह माह में तीन हजार रुपये खर्च किए जाने का प्रावधान है। मतलब 500 रुपये प्रतिमाह सफाई सामग्री पर खर्च किए जा सकते हैं। इसका मतलब है कि एक साल में 1293 सामुदायिक शौचालयों की सफाई के लिए 77.58 लाख रुपये खर्च हो रहे। अब सवाल यह भी है कि जब शौचालयों का इस्तेमाल नहीं हो रहा, साफ-सफाई भी नहीं हो रही तो सफाई सामग्री या इसका बजट आखिर किसकी जेब में जा रहा है।

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सामुदायिक शौचालयों का इस्तेमाल हो या न हो लेकिन इनका समय से खुलना जरूरी है। देखरेख करने के लिए केयर टेकर लगे हैं तो केयर टेकर को दिन में कम से कम एक बार तो साफ-सफाई करनी ही चाहिए। सफाई सुनिश्चित कराने के लिए ब्लॉकवार केयर टेकरों की कार्यशाला कर इन्हें सक्रिय किया जाएगा। जो काम नहीं करेगा उसे मानदेय भी नहीं मिलेगा। -अनुनय झा, डीएम

सामुदायिक शौचालयों के इस्तेमाल और रख रखाव को लेकर एक कंट्रोल रूम जिला मुख्यालय पर बना है। ब्लॉक मुख्यालयों पर भी कंट्रोल रूम हैं। सामुदायिक शौचालयों को लेकर अगर कोई शिकायत आती है तो निस्तारण कर फीडबैक भी लिया जाता है। -श्रेया उपाध्याय, डीपीआरओ

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