हरदोई। कृषि फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए परंपरागत तरीकों को छोड़कर रासायनिक खादों के अत्यधिक प्रयोग से जिले की माटी की सेहत खराब हो रही है। खेतों की प्राकृतिक उर्वरक शक्ति लगातार कम हो रही, जिससे आने वाले समय में भूमि के बंजर होने की आशंका है।
जिले के कुछ ब्लाक क्षेत्रों में भूमि की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति के नष्ट होने का खतरा कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है।
बीते वर्षों में हुए मृदा परीक्षण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए थे, जिसके बाद जिले का कृषि महकमा किसानों को जागरूक करने के साथ ही जैविक खादों को बनाने एवं प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया कर रहा है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जैविकता की ओर लौटने से ही मिट्टी की सेहत सुधरेगी और प्राकृतिक उर्वरा शक्ति बढ़ेगी। कृषि विभाग की शोध इकाई से मिली जानकारी के अनुसार, रसायनिक खादों के प्रयोग से खेतों की सेहत बड़ी समस्या हो चुकी है।
परीक्षण में यह बात सामने निकलकर आ चुकी है कि पूरे जिले में कृषि भूमि में कार्बन एवं नाइट्रोजन का अनुपात बिगड़ रहा है। साथ ही कार्बन जीवाश्म का स्तर भी संतुुलित नहीं है, जिससे भूमि की प्राकृतिक उर्वरक शक्ति प्रभावित होने के साथ ही उत्पादकता पर असर पड़ता है।
संडीला, कछौना, बेहंदर ब्लाक क्षेत्रों में कृषि भूमि की उर्वरक शक्ति पर प्रतिकूल असर पड़ रहा, जबकि माधौगंज, मल्लावां तथा टड़ियावां ब्लाक के कुछ हिस्सों में भी कृषि भूमि की उत्पादकता प्रभावित हो रही है।
हरी एवं जैविक खादों का बढ़ाएं प्रयोग
कृषि वैज्ञानिक डाक्टर पीपी सिंह कहते हैं कि कृषि भूमि पर रसायन खादों का अत्यधिक प्रयोग बहुत ही खतरनाक है। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे नष्ट होने लगती है।
एक समय ऐसा आता है, जब बिना रासायनिक खादों के प्रयोग से फसल उगाना मुश्किल हो जाता है और फिर धीरे-धीरे वह क्षेत्र बंजर होने की ओर बढ़ जाता है।
जैविक खाद मुहैया कराए सरकार
सांडी ब्लाक क्षेत्र में खेतों की सेहत पहले जैसी नहीं है। दो साल पहले खेेतों की मिट्टी की परीक्षण कराया था, जिसमें पोषक तत्वों की कमी मिली थी। इसके बाद खेतों में ढैंचा आदि के साथ गोबर की खाद की व्यवस्था करते हैं, मगर सच्चाई यह हैकि जितनी मात्रा में जरूरत है, मिल नहीं पाती।
- अनिल कुमार, प्रगतिशील किसान
हरी, जैविक खादों से उपज गुणवत्तापरक होती है, मगर रासायनिक खादों के मुकाबले उपज की मात्रा घट जाती है, क्योंकि पर्याप्त मात्रा में जैविक एवं हरी खादों की व्यवस्था आसान नहीं है। रसायनिक खादें आसानी से मिलती हैं, जिससे प्रयोग उपज बढ़ाने में खूब हो रहा।
-राम बिलास
पहले एक बीघा खेत में एक से डेढ़ बोरी रासायनिक उर्वरक डालते थे, अब फसलों का उत्पादन बढ़ाने को दो बोरी तक यूरिया और डीएपी मिलाकर डालते हैं। इससे फसल की उपज तो नहीं घट रही, मगर हर साल खाद की मात्रा बढ़ानी पड़ती है।
- राकेश, बाबन ब्लाक
उपज कम न हो, इसलिए खाद की मात्रा हर साल बढ़ती रहती है। जैविक एवं हरी खादों की उपलब्धता सरकार को करानी चाहिए, ताकि सुलभता एवं सस्ती दरों पर यह खाद मिल सके और रासायनिक खादों के प्रयोग में कमी आ सके।
- नागेश्वर प्रसाद, किसान
दो साल से बंद सरकारी मृदा परीक्षण
कोविड टाइम के चलते पिछले दो साल से सरकारी स्तर से मृदा परीक्षण कार्यक्रम पर ब्रेक लगा हुआ है। उससे पहले तक हर वर्ष कई क्षेत्रों के लगभग 14 हजार नमूनों का परीक्षण होता था, जिसमें लगातार खेतों की मिट्टी की सेहत खराब होने के तथ्य सामने आए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, चालू वित्तीय वर्ष में अब तक 49 किसानों ने यहां लैब में आकर नमूने टेस्ट कराए हैं, इनमें भी अधिकांश नमूनों में मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी मिली है। किसी भी नमूने में मिट्टी की सेहत पूरी तरह से स्वस्थ नहीं मिली है।
अब जगी आस, जैविकता आएगी पास
नमामि गंगे योजना के तहत गंगा के किनारे वाले गांवों में जैविक खेती को बढ़ावा देने की सरकार की योजना के साथ बजट में इस ओर प्रावधान किए जाने से जिले में जैविक खादों की उपलब्धता से लेकर खेती को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जगी है।
डीडी कृषि डॉ. नंद किशोर ने बताया कि जिले में अभी करीब पांच सौ किसान पौने चार सौ हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती कर रहे हैं। बताया कि किसानों को हरी खाद एवं जैविक खादों के उपयोग के प्रोत्साहित करने के साथ ही रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
माटी को स्वस्थ रखने के लिए किसानों को ढैंचा
आदि की हरी खाद के साथ जैविक खादों का का प्रयोग करते रहना चाहिए। गोबर और घूरे से बनने वाली खाद भी खेतों के लिए काफी लाभकारी है। यदि सिर्फ रासायनिक खादों का ही उपयोग लंबे समय तक होता है, तो जाहिर सी बात है कि खेतों की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति क्षीण होने लगती है।
- डॉ. पीपी सिंह, कृषि वैज्ञानिक