गरीबों को सस्ता और सुलभ न्याय मिले, इसके लिए शासन
स्तर से तहसील मुख्यालयों पर मुंसिफ कोर्ट की स्थापना की व्यवस्था की गई
है, पर लाखों की लागत से भवन का निर्माण कराने के बावजूद यहां मुंसिफ कोर्ट
की स्थापना नहीं हो पा रही है। इसको लेकर वकील और पैरोकार परेशान हैं।
तहसील
के वादकारियों को मुकदमे की पैरवी को करीब 70 किमी की यात्रा तय कर जिला
मुख्यालय आना पड़ रहा है। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान वर्ष 1937 में खत्म की
गई मुंसिफी कोर्ट के लिए क्षेत्र के वकीलों और वादकारियों को उम्मीद थी कि
आजादी के बाद यहां मुंसिफ कोर्ट की पुुन: स्थापना होगी, पर यह सपना अभी तक
साकार नहीं हो सका है।
वर्ष 2002 में तत्कालीन राज्य योजना आयोग के
उपाध्यक्ष गंगा भक्त सिंह ने पुराने तहसील भवन के पास पड़ी जमीन का सर्वे
कराया और पुराने भवन को गिरवाकर नए भवन के लिए प्रस्ताव तैयार कर शासन से
27 लाख का बजट भी मंजूर करा भवन निर्माण करवाया, पर इसके बावजूद इस
नवनिर्मित भवन में मुंसिफी कोर्ट की स्थापना नहीं की गई।
हैरत की बात है
कि क्षेत्रीय जनता ने जिस भी जनप्रतिनिधि को यहां से चुना, उसी पार्टी की
सूबे में सरकार बनी, उसके बावजूद मुंसिफी कोर्ट का मामला ठंडे बस्ते में
पड़ा रहा। वकीलों ने जब नवनिर्मित भवन में न्यायिक कार्य शुरू कराने की
मांग की तो न्यायिक अधिकारियों के आवास न होने की समस्या आड़े आ गई।
कुछ
माह पहले न्यायिक अधिकारियों ने नवनिर्मित भवन का जायजा लिया और एसडीएम से
न्यायिक अफसरों के आवास के लिए जगह मुहैया कराने की बात कही, जिस पर एसडीएम
ने नगर के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की खाली भूमि का
प्रस्ताव तैयार करवाकर भेज दिया। इसके बावजूद भी यह मामला ठंडे बस्ते में
पड़ा है।
उधर, तहसील क्षेत्र के शाहाबाद, पिहानी और टोडरपुर ब्लाक
क्षेत्र के मुकदमों की पैरवी के लिए अधिवक्ताओं और वादकारियों को करीब 70
किमी दूर स्थित जिला मुख्यालय पर आना पड़ता है, जिससे जहां उन्हें आने जाने
पर अधिक भाड़ा खर्च क रना होता है, वहीं समय की भी बर्बादी होती।
उधर, अगर
मुंसिफ कोर्ट शुरू हो गई तो शाहाबाद तहसील क्षेत्र के लोगों को साधारण
प्रगति के मुकदमों के लिए जिला मुख्यालय नहीं जाना पड़ेगा। मुंसिफी कोर्ट
में दीवानी व फौजदारी दोनों तरह के मुकदमों की सुनवाई होगी।