प्रदेश सरकार प्रदेश में भले ही स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर करने का दंभ भर रही
हो, पर जिले के सरकारी अस्पताल में सुविधाएं सिर्फ कागजों में ही नजर आती
हैं। अस्पताल में पहुंचने वाले मरीजों को सुविधाएं तो दूर चिकित्सक भी समय
पर नहीं मिलते है। मरीजों के तीमारदारों की सुविधाएं के लिए बनाए गए रैन
बसेरों में विभागीय ठेकेदार काबिज है। इससे मरीजों व उनके तीमारदारों को
ठंड से दो चार होना पड़ता है।
अस्पताल में सुविधा न
मिलने के कारण मरीजों को निजी चिकित्सकों का सहारा लेना पड़ रहा है। जिला
अस्पताल व महिला अस्पताल का सोमवार को नजारा कुछ ऐसा ही दिखाई दिया। उधर,
महिला अस्पताल इन दिनों गन्ना नेत्र चिकित्सालय में संचालित है। वहां पर भी
प्रसूताओं के लिए गैलरी में बेड डाल दिए गए हैं।
गैलरी में लगी खिड़कियों
के शीशे गायब हैं। इसके अलावा कई स्थानों पर हवा के रोकने की कोई व्यवस्था
नहीं है। इस कारण ठंडी हवा सीधे गैलरी में पहुंचती है। इससे यहां पर भर्ती
प्रसूताएं और बच्चे ठंड का शिकार हो रहे हैं। मरीजों को ठंड के बचाव के लिए
अपने स्वयं के संसाधनों को लाना पड़ता है।
इसके अलाव साफ सफाई न होने
से वहां पर ठहराना मुश्किल है। इतना ही नहीं महिला अस्पताल में मरीजों के
तीमारदारों के लिए कोई पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। वहां पर तीमारदारोें के
लिए टीन शेड डाल कर रैन बसेरा बनाया गया है। रैन बसेरा की ठंडी जमीन व खुला
स्थान तीमारदारों की रात में परीक्षा लेता है।
इससे तीमारदार खुद बीमार हो
रहे है। तीमारदारों के लिए वहां पर ठंड के बचाव के कोई उपाय नहीं है। इसी
तरह जिला अस्पताल में स्थाई रैन बसेरा बने हुए हैं, पर उन पर विभागीय
ठेकेदारों का कब्जा है। शांती रैन बसेरा पर महिला अस्पताल को भोजन देने
वाले ठेकेदार ने कब्जा कर रखा है।
उसमें महिला अस्पताल में भोजन बंटने के
लिए बनाया जाता है, इसलिए रैन बसेरा रसोई घर बनकर रह गया है। उसका लाभ
तीमारदारों को नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा अन्य एक रैन बसेरा पर
विभागीय कर्मचारियों को कब्जा है। तो हड्डी वार्ड के पास बने कक्ष में
अस्पताल के अन्य कार्यों के ठेकेदार का कब्जा है।
इससे तीमारदारों को खुले
में राते बितानी पड़ रही है। इसके अलावा जिला अस्पताल में वार्डों में
भर्ती मरीज भगवान भरोसे छोड़ दिए जाते हैं। उनकी देखरेख के लिए न तो स्टाफ
मिलता है और न ही संसाधन। वार्ड में मरीज को एक कंबल देकर कार्य की इतिश्री
कर ली जाती है।
इससे मरीजोें को ठंड से बचने को स्वयं ही व्यवस्था करनी
पड़ती है। वार्ड के स्टाफ को खोजना जिला अस्पताल में टेड़ी खीर है। वह कभी
भी वार्ड के स्टाफ रूम में मिलता ही नहीं है। जिला अस्पताल में डॉक्टर
की कमी है और जो हैं, उनको ट्रेन पकड़ने की जल्दी रहती है। आकस्मिक मौके पर
कोई भी चिकित्सक मुहैया नहीं होता है।
इससे तीमारदारों को मरीज को अन्य
स्थान पर ले जाना होता है। इससे कई बार मरीजों को समय पर इलाज न मिलने से
जान से हाथ धोना पड़ता है। उधर, प्रधानमंत्री साफ सफाई पर विशेष ध्यान देने
की अपील कर चुके हैं, पर अस्पताल प्रशासन को यह अपील सुनाई नहीं देती है।
जिला अस्पताल के आकस्मिक कक्ष में साफ सफाई का यह हाल है कि उससे उठती
दुर्गंध से दो मिनट ठहराना भी मुश्किल है, पर मजबूरी में मरीजों व
तीमारदारों को खड़ा होना पड़ता है। यही हाल अन्य वार्डों का भी है।