हरदोई। नाग पंचमी का पर्व रविवार को धूमधाम से मनाया जाएगा। सपेरों को इस त्यौहार का खासा इंतजार रहता है। शनिवार को भी शहर में कई जगह सपेरे घूमते दिखाई दिए।
बताया जाता है कि कोबरा, करैल और सैनाथ जैसे सांपों का जहर उतारने में सपेरे माहिर होते हैं। ये समय की मार है कि सपेरे अपनी जिंदगी का जहर नहीं उतार पा रहे हैं। इससे सपेरों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। गुजर बसर के लिए दो जून की रोटी भी न कमा पाने के कारण सपेरे अपना पुश्तैनी व्यवसाय बदलने को मजबूर हैं। कोई पत्थर तोड़ कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा है तो कोई अन्य व्यवसाय। कुछ लोग तो सिर्फ नाग पंचमी जैसे पर्वों के आस पास ही अपनी बीन निकालते हैं।
जानकारों के मुताबिक जिले के ग्राम चरौली व बावन के जोगीपुरवा आदि गांवों को सपेरों की बस्तियों के रूप में जाना जाता था। समय व हालातों की मार के बाद ये सपेरों की बस्तियां कम होती जा रही हैं। जोगीपुरवा के जुग्गा का कहना है कि वह चाहते हैं कि उनका यह पुश्तैनी काम उनकी नई पीढ़ी भी सीखे लेकिन इस धंधे में कोई कमाई न होने के कारण लोग ये व्यवसाय छोड़ कर दूसरे जिलों में मजदूरी करने को विवश हैं।
खौफ से मरते हैं 80 फीसदी लोग
यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि सांप के काटने के बाद भी मात्र 20 फीसदी लोग ही सांप के जहर से मरते हैं, जबकि शेष 80 प्रतिशत लोग खौफ से ही मर जाते हैं। डा. अमरजीत अजवानी का कहना है कि अधिकतर देखा गया है कि यदि किसी को सांप काटता है और वह उससे डरता नहीं है तो उसकी मौत नहीं होती है। वहीं, यदि सांप को देखकर लोग मूर्छित से होने लगते हैं तो उनकी मौत खौफ में हो जाती है। सर्वे के मुताबिक चार फीसदी सांपों में ही जहर होता है और विश्व में सांप की 2500 से अधिक नस्लें हैं।
आज पूजे जाएंगे नागदेव
शास्त्री उमाकांत दीक्षित ने बताया कि हिंदू धर्म में सावन माह शिव भक्ति का शुभ काल है। इस काल में शिव व उनके नाम, स्वरूप व शक्तियों का अलग-अलग रूपों, तरीकों से स्मरण किया जाता है। भगवान शिव को कालों का काल कहा जाता है। भगवान शिव के गले में नाग का हार पहनना और कंठ में विष उतारकर नीलकंठ बन जाना इसका प्रमाण है कि सर्प काल का ही रूप माना जाता है। यही कारण है कि सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी के पुष्प काल में नाग पंचमी सात अगस्त पर नागों के देवता रूप में पूजा कर सुख शांति की कामना की जाती है। यह दिन को नाग जाति के जन्म का दिन भी माना जाता है। यह पर्व जिले में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन जिले में भी बहनें गुड़िया बनाती हैं और भाइयों के इन गुड़ियों को भी पीटने की परंपरा है। इसके अलावा श्री श्रवण देवी मंदिर के बाहर परिसर में बड़े मेले का आयोजन होता रहा है। इस बार भी मेले को लेकर तैयारियां जोर शोर से हैं।