भूकंप या धरती का डोलना पुराने समय से लोगों के लिए
भयंकर चिंता का विषय रहा है। प्राचीन काल में जहां इसे दैवीय आपदा का एक
अंश माना जाता रहा है, वहीं 16वीं व 17वीं शताब्दी में इसे धरती के अंदर
रासायनिक विस्फोटन के बाद की प्रतिक्रिया बताया गया।
18वीं शताब्दी में
जहां इसके पीछे ज्वालामुखी के फटने को कारण समझा गया, वहीं 19वीं व 20वीं
शताब्दी में जाकर भूकंप के कारणों से पर्दा हटा। हालांकि, शनिवार और
रविवार को धरती के डोलने के बाद जिले भर में भूकंप के कारणों को लेकर ही
चर्चा होती रही।
इस बाबत मौसम वैज्ञानिक जयशंकर मिश्र बताते हैं कि प्राचीन
सभ्यताओं व मान्यताओं के आधार पर यहीं माना जाता रहा है कि धरती सर्प के
फन पर टिकी है, जब फन इधर-उधर होता है तो धरती हिलती है, जिससे भूकंप आता
है। 16वीं व 17वीं शताब्दी में आते आते बुद्धिजीवियों ने धरती के नीचे जाना
कि रासायनिक पदार्थों के फटने के बाद भूकंप आते हैं, तो इसके बाद 19वीं व
20वीं शताब्दी में बुद्धिजीवी इस तर्क पर पहुंचे कि भूगर्भिक शैलों में
तनाव होने के बाद कंपन होने से भूकंप आता है।
जीआईसी के विज्ञान शिक्षक
सतीश यादव का कहना है कि अब तक जितने भी भूकंप इस भूमंडल पर हुए हैं, उन सब
का ब्योरा एकत्र कर देखा जाए तो पता चलता है कि निश्चित रूप से कोई ऐसा
क्षेत्र नहीं है, जहां पर भूकंप न आया हो।
उन्होंने लोगों से अपील की कि
घबराएं नहीं, क्योंकि दो दिनों में आए भूकंप में दूसरे दिन की तीव्रता कम
बताई गई है, जिससे यह तय है कि अब कोई ऐसी घटना नहीं होगी, जिसको हम सब
मिलकर संभाल न सकें, पर भयभीत होकर कोई ऐसा कार्य न करें जिससे अनजाने में
कोई दुखद घटना हो, इसलिए धरती को कांपते जब भी महसूस करें, सुरक्षित
स्थानों की तरफ भागें।